मेरी माँ कामिनी - भाग 33
(कुछ मिनट पहले: बगीचे में)
रमेश नशे में धुत होकर कुर्सी पर झूल रहा था। उसके हाथ से गिलास छूटने को हो रहा था।
सामने जल रही लकड़ियाँ अब राख बन चुकी थीं, आग बुझने की कगार पर थी।
"अबे... ये कादर कहाँ मर गया?" रमेश लड़खड़ाती जुबान में बड़बड़ाया। "सूप भी ठंडा हो रहा है... और आग भी ठंडी हो गई।"
शमशेर ने अपनी सिगरेट का कश खींचा और उसे पैर से मसल दिया।
"तू बैठ रमेश... मैं देखता हूँ। थोड़ी लकड़ियाँ और ले आता हूँ, लगाता हूँ चूल्हे मे" शमशेर अपनी कुर्सी से उठा।
शमशेर अंधेरे में चलता हुआ स्टोर रूम के पास लकड़ियों के ढेर की तरफ गया। वहाँ कुछ नहीं मिला, वो थोड़ा आगे बड़ा की उसे खिड़की से आतिज़ रौशनी मे कुछ लकड़िया दिखाई दी,
लकड़ियों का ढेर कामिनी के बेडरूम की खिड़की के ठीक नीचे था।
वह पास गया और झुककर लकड़ी उठाने ही वाला था कि तभी...
सन्नाटे में उसे एक दबी हुई आवाज़ सुनाई दी।
"आह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फ.... कादर...."
शमशेर का हाथ हवा में रुक गया।
यह आवाज़ किसी बिल्ली की नहीं, एक औरत की सिसकारी थी।
और वो औरत कोई और नहीं, उसके खास दोस्त रमेश की बीवी कामिनी की थी।
शमशेर ने गर्दन उठाई ।
बेडरूम की खिड़की के पल्ले हल्के से खुले हुए थे। पर्दा नाम मात्र माँ लगा हुआ था।
अंदर ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
शमशेर ने सांस रोकी और दबे पांव खिड़की के पास गया।
उसने उस झीरी (Gap) से अंदर झांका।
और जो उसने देखा... उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
बेड पर कामिनी अपनी साड़ी समेटे, टांगें चौड़ी किए पड़ी थी।
और उसके दोनों पैरों के बीच... वह 'गुंडा, कसाई दो कोड़ी का मटन काटने वाला कादर खान अपना मुंह गड़ाए हुए था।
शमशेर की आँखों ने देखा कि कैसे कादर की जीभ कामिनी की गुलाबी गुफा को चाट रही थी।
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..." की आवाज़ें अब शमशेर को साफ़ सुनाई दे रही थीं।
शमशेर का लंड, जो पैंट के अंदर सोया हुआ था, एक झटके में लोहे की रॉड बन गया।
'साला... यह क्या चल रहा है?' शमशेर का दिमाग चकरा गया।
'साला इसे तो मैं सती-सावित्री समझता था... और यहाँ ये रांड इस कल के आए लौंडे से अपनी चुत चटवा रही है?'
शमशेर की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि हवस और जलन थी।
उसे जलन इस बात की थी कि वह जगह (कामिनी की टांगों के बीच) उसकी होनी चाहिए थी, लेकिन वहां कादर मज़े ले रहा था।
उसने देखा कामिनी तड़प रही थी।
कामिनी ने कादर के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे अपनी योनि पर दबा रही थी।
"चूस कादर.... खा जा मेरी चुत.... आह्ह्ह्ह... मुझे ख़त्म कर दे...."
कामिनी के ये शब्द शमशेर के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे।
'अरे बाप रे... यह तो पूरी खिलाडी निकली...' शमशेर ने अपने होंठों पर जीभ फेरी। 'इतनी प्यास? इतनी आग?'
उसने देखा कि कामिनी की कमर हवा में उठने लगी है। वह क्लाइमेक्स (झड़ने) के करीब थी।
शमशेर की पुलिसिया खोपड़ी ने तुरंत काम किया।
'अगर यह अभी झड़ गई... तो इसकी आग शांत हो जाएगी। और फिर यह मुझे भाव नहीं देगी।'
'नहीं... इसे शांत नहीं होने देना। इसे तड़पाना है।'
एक भूखे जानवर को काबू करना आसान होता है,
शमशेर के दिमाग में एक वहशी प्लान ने जन्म लिया।
उसने तुरंत खिड़की से हटकर अपनी नज़रें रमेश की तरफ घुमाईं और अपनी आवाज़ को भारी और ऊँचा कर लिया।
उसने जानबूझकर ठीक उसी वक़्त चिल्लाया जब कामिनी चरम पर थी।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
उसकी आवाज़ अंदर बम की तरह फटी।
शमशेर ने खिड़की की झीरी से देखा—कादर झटके से पीछे हटा और कामिनी बिस्तर पर अधूरी तड़पती रह गई।
शमशेर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई।
'तड़प मेरी जान... तड़प... अब तेरी यह अधूरी आग मैं बुझाऊंगा। कादर ने तो सिर्फ़ सुलगाया है... राख तो मैं करूँगा।'
शमशेर ने जल्दी से वहां से हटकर अपनी जगह वापस ले ली, जैसे उसे कुछ पता ही न हो।
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वही कहीं इस घर से दूर
स्थान: पुलिस कमिश्नर ऑफिस, शहर | समय: रात के 12:15 बजे)
कमरे में एसी की 'हम्म्म' की आवाज़ के अलावा सिर्फ़ बूटों की 'ठक-ठक' गूंज रही थी।
पुलिस कमिश्नर विक्रम सिंह एक घायल शेर की तरह अपने केबिन में इधर से उधर टहल रहा था।
उसकी वर्दी की बांहें ऊपर चढ़ी हुई थीं, टाई ढीली थी, और आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसकी आँखें लाल थीं—गुस्से से और थकान से।
"धत् तेरे की!" विक्रम ने टेबल पर मुक्का मारा। कांच का पेपरवेट हिल गया।
कल रात की रेड... उसके करियर का एक काला धब्बा बन गई थी।
उसे पक्की खबर थी कि कादर खान ढाबे पर ड्रग्स की बड़ी खेप के साथ मौजूद है। लेकिन जब उसकी टीम वहां पहुंची, तो चिड़िया उड़ चुकी थी। ढाबा खाली था।
कादर खान और 50 लाख का माल... दोनों हवा हो गए थे।
विक्रम के लिए यह सिर्फ़ एक केस नहीं, उसकी नाक का सवाल था। वह हार मानने वालों में से नहीं था।
तभी केबिन का दरवाज़ा हल्का सा खुला।
हवलदार ने डरते-डरते झांका।
"स... साहब..." हवलदार की आवाज़ कांप रही थी। "वो... वो खबरी आया है। 'कल्लू काना'। बोल रहा है बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"
विक्रम की आँखों में खून उतर आया।
"भेजो साले को अंदर..." विक्रम गुर्राया। "आज अगर उसने बकवास की, तो उसकी दूसरी आँख भी फोड़ दूंगा। हरामखोर ने मेरी इज़्ज़त मिटटी में मिला दी।"
दो मिनट बाद, एक मरियल, गंदा और शराब की बदबू में डूबा हुआ आदमी लगभग घिसटता हुआ अंदर आया।
उसके कपड़े फटे थे और वह नशे में झूल रहा था।
विक्रम ने उसे देखते ही अपना आपा खो दिया।
उसने लपककर उस खबरी की गिरेबान पकड़ी और उसे दीवार से सटा दिया।
"आ साले मादरचोद..." विक्रम चिल्लाया। "तूने गलत टिप दी मुझे? मेरा टाइम ख़राब किया?"
विक्रम का हाथ उठा, वह उसे मारने ही वाला था।
"मलिक... मलिक... रहम!" खबरी गिड़गिड़ाया। उसके हाथ जुड़ गए। "खबर सही थी मेरी माई-बाप... कसम खुदा की! कादर खान ड्रग का धंधा करता है और वो वहीं था।"
"तो कहाँ गया वो?" विक्रम ने उसकी गर्दन दबोच ली, उसकी सांसें घुटने लगीं। "कहाँ है कादर खान? कहाँ है उसकी ड्रग? ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया?"
"साहब... वही... वही तो बताने आया हूँ..." खबरी ने मुश्किल से सांस ली।
विक्रम ने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की।
"बक! जल्दी बक!"
खबरी ने हांफते हुए कहा, "कादर खान वहां से माल लेके भाग गया था साहब। उसे भी किसी ने टिप दे दी थी कि पुलिस आ रही है।"
विक्रम की भौहें तन गईं। 'पुलिस की रेड की खबर लीक हुई? मतलब विभाग में कोई गद्दार है?'
खबरी ने अपनी बात जारी रखी, "आज शाम... जब मैं देसी ठेके पर था, तो एक आदमी नशे में बड़बड़ा रहा था। मैंने उससे दोस्ती की... उसे थोड़ी और पिलाई।"
खबरी ने एक कुटिल हंसी हंसी। "दारू पेट में जाती है तो राज़ बाहर आते हैं साहब।"
"उसने बताया उसका नाम रघु है... साला कभी कादर के ढाबे पर रहता था। आज हिचहह.... हिचहह..." खबरी को हिचकी आ गई।
"आज क्या?" विक्रम का सब्र टूट रहा था। उसने उसे झिंझोड़ा। "पूरा बोल!"
"आज साला बोल रहा था कि वो मेरे घर पर पड़ा हुआ है।"
"कौनसा घर? कैसा घर?" विक्रम उत्तेजना में चिल्लाया।
"बंगला नंबर 69..." खबरी ने धीरे से कहा।
विक्रम चौंक गया। "बंगला नंबर 69? सिविल लाइन्स वाला इलाका?"
विक्रम ने खबरी को घूरा। "साले, वो पॉश इलाका है। वहां बड़े अफ़सर और रईस लोग रहते हैं। वो शराबी वहां कैसे रह सकता है? तू फिर मुझे घुमा रहा है?"
विक्रम ने गुस्से में खबरी का कान पकड़कर मरोड़ दिया।
"आईईईई.... साहब पूरा तो सुनो बाप..." खबरी दर्द से बिलबिलाया। "वो उस बंगले का मालिक नहीं है। वो वहां नौकर है। कुछ दिन पहले ही वहां के बाबू ने उसे काम पर रखा है। वो अपना नाम रघु बताता है, और बोलता है कादर उसका पुराना जिगरी यार है।"
विक्रम ने खबरी को छोड़ा।
उसका दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा।
'कादर का पुराना दोस्त... रघु... बंगला नंबर 69 में नौकर है। और कादर गायब है।'
'यानी कादर खान कहीं भागा नहीं है... वो शहर के बीचों-बीच, एक रईस बंगले में, नौकर के क्वार्टर में छुपा बैठा है। पुलिस जंगलों, सस्ते होटेलों और ढाबों में खाक छान रही है, और वो एसी बंगले में मज़े कर रहा है!'
विक्रम के चेहरे पर एक शिकारी की चमक आ गई।
उसने तुरंत लैंडलाइन फ़ोन उठाया और नंबर घुमाया।
"ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन..."
उधर पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर मोहन ऊंघ रहा था। फ़ोन की घंटी सुनकर वह हड़बड़ाकर उठा।
"ह... हेलो? पुलिस स्टेशन...सिविल लाइन"
"मोहन!" विक्रम की आवाज़ में बिजली कड़क रही थी। "कमिश्नर विक्रम बोल रहा हूँ।"
मोहन कुर्सी से खड़ा होकर सावधान की मुद्रा में आ गया। "जय हिन्द सर! सलाम सर!"
"सलाम छोड़," विक्रम ने कड़क कर पूछा। "थाना इंचार्ज शमशेर सिंह कहाँ है? उसे फ़ोन दे।"
मोहन के पसीने छूट गए।
"स... सर... वो तो घर गए। उनकी शिफ्ट ख़त्म हो गई थी। शाम को ही निकल गए थे।"
"बास्टर्ड...!!" विक्रम चिल्लाया। "पुलिस कभी ऑफ़ ड्यूटी नहीं होती! शहर में इतना बड़ा क्रिमिनल घुम रहा है और ये हरामखोर घर जाकर सो रहा है?"
विक्रम ने एक पल सोचा, फिर आदेश दिया।
"मोहन, कान खोलकर सुन। अभी के अभी, पूरी फोर्स तैयार कर। एक रेड करनी है।"
"जी सर... कहाँ सर?" मोहन ने कांपते हुए पूछा।
"शहर के बंगला नंबर 69 में।"
विक्रम की आवाज़ में मौत का सन्नाटा था।
"मैं खुद वहां पहुँच रहा हूँ। तुम अपनी जीप लेकर निकलो। बंगले को चारों तरफ से घेर लो। एक भी परिंदा अंदर नहीं जाना चाहिए और एक भी चूहा बाहर नहीं निकलना चाहिए। समझ गया?"
"जी... जी सर! समझ गया!" मोहन ने फ़ोन रख दिया और "रेड अलर्ट" का सायरन बजा दिया।
विक्रम ने फ़ोन पटका।
उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर चेक की, उसे लोडेड किया और होल्स्टर में डाला।
उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे।
"कादर खान..." विक्रम बड़बड़ाया। "आज तू पाताल में भी छुपा होगा, तो घसीट कर निकालूँगा।"
वह लंबे डग भरता हुआ अपनी जीप की तरफ बढ़ा।
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वहीँ दूसरी तरफ... शहर के उसी बंगला नंबर 69 में...
बाहर का गेट बस आपस मे सटा हुआ था किसी को सुध नहीं थी की उसे बंद किया जाये,
घर का मालिक रमेश, शराब और मटन के नशे में बेड पर औंधे मुंह पड़ा था, दुनिया से बेखबर।
और उसके बेडरूम में...
उसकी खूबसूरत बीवी कामिनी दीवार से सटी खड़ी थी, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसका पल्लू ज़मीन पर था, और छाती खुली हुई थी।
और उसके ठीक सामने...
उस इलाके का थाना इंचार्ज, दरोगा शमशेर सिंह खड़ा था।
जिसकी खाकी पैंट में 'तंबू' बना हुआ था और जिसकी आँखों में वहशीपन था।
उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस 'शिकार' (कामिनी) को वह खाने जा रहा है...
उसके घर के बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन और कमिश्नर विक्रम के कदम बस कुछ ही पलों की दूरी पर हैं।
एक तूफ़ान बाहर आ रहा था... और एक तूफ़ान अंदर आने वाला था।
बेडरूम में रमेश के खर्राटों की गूंज थी, लेकिन कामिनी के कानों में सिर्फ़ अपनी धड़कनों का शोर और शमशेर की भारी सांसें थीं।
शमशेर ने कामिनी को दीवार से सटा रखा था। उसका विशाल शरीर कामिनी के लिए एक पिंजरे की तरह था।
कामिनी की नज़रें नीचे झुकी हुई थीं, जहाँ शमशेर की खाकी पैंट का ज़िप अब खुल चुका था।
शमशेर ने एक हाथ से अपनी पैंट नीचे सरकाई और अपना अंडरवियर भी खींच दिया।
"फटाक..."
इलास्टिक छूटने की आवाज़ के साथ ही शमशेर का विशाल, काला और लोहे जैसा सख्त लंड आज़ाद होकर बाहर उछल आया।
वह पूरी तरह तना हुआ था, हवा में झूल रहा था और कामिनी के पेट को लगभग छू रहा था।
कामिनी की आँखें उस मर्दाने हथियार पर गड़ गईं।
कादर का लंड 'जंगली' था, लेकिन शमशेर का लंड 'ताकतवर' था। वह मोटा था, और उसका सुपाड़ा (Head) गुस्से में लाल होकर चमक रहा था।
कामिनी की योनि, जो कादर के अधूरेपन से तड़प रही थी, अब उस पुलिसिया डंडे को महसूस करने के लिए मचल उठी।
उसका हाथ अनजाने में ही आगे बढ़ा।
उसकी उंगलियां उस गरम और नसों भरे लंड को अपनी मुट्ठी में भरने के लिए तड़प रही थीं।
लेकिन शमशेर खिलाड़ी था। वह शिकार को इतनी आसानी से शिकार नहीं करने देने वाला था।
"ना... ना..."
जैसे ही कामिनी का हाथ वहां पहुंचा, शमशेर ने उसका हाथ झटक दिया।
उसने कामिनी की साड़ी का पल्लू, जो पहले ही गिर चुका था, उसे एक झटके में पूरी तरह खींच लिया।
"पहले कपड़े उतारो..." शमशेर का आदेश स्पष्ट और खूंखार था। "ब्लाउज़ और पेटीकोट... सब कुछ। मुझे तुम्हारे जिस्म का कोना-कोना देखना है।"
कामिनी के पास कोई रास्ता नहीं था। वासना ने उसे लाचार बना दिया था।
कांपते हाथों से उसने अपनी कमर पर बंधी पेटीकोट की डोरी खोली।
"सर्रररर......"
रेशमी साड़ी और पेटीकोट एक साथ उसके पैरों पर गिरकर ढेर हो गए।
अब वह सिर्फ अपने ब्लाउज़ में खड़ी थी।
कामिनी ने अपने कन्धों को झटका, और ब्लाउज़ भी सरककर ज़मीन पर गिर गया।
शमशेर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसने सुनैना को देखा था, कई औरतों, कोठे की रंडियो को देखा था, लेकिन कामिनी... कामिनी का जिस्म किसी संगमरमर की मूरत जैसा था, जो वासना की आग में तपकर गुलाबी हो गया था।
उसका बदन मक्खन जैसा गोरा और गठा हुआ था।
सबसे पहले शमशेर की नज़र उसके विशाल और भारी स्तनों पर गई।
वे पसीने से सने हुए थे और तेल की तरह चमक रहे थे।
वे इतने भारी थे कि उनका वजन कामिनी की छाती पर साफ़ दिख रहा था, लेकिन फिर भी वे तनकर खड़े थे।
कादर के चूसने और कामिनी की उत्तेजना की वजह से, उन गोरे स्तनों पर नीली नसें (Blue Veins) साफ़ उभर आई थीं, जो किसी नक्शे की तरह उसके निप्पलों तक जा रही थीं।
और उसके निप्पल...
मोटे, काले और बेर की तरह सख्त। वे अकड़े हुए थे और शमशेर को चुनौती दे रहे थे।
नीचे उसकी गहरी नाभि, और फिर उसकी चौड़ी कमर जो किसी सुराही की तरह थी।
और उन भरी हुई जांघों के बीच... उसका कामुक त्रिकोण... जहाँ बाल का कोई नामोनिशान नहीं था, एक दम साफ चिकना खूबसूरत, जहाँ से अब भी रस बह रहा था।
"उफ्फ्फ्फ... क्या चीज़ हो तुम कामिनी..."
शमशेर के मुंह से लार टपकने को हो गई।
उससे अब रहा नहीं गया।
उसने एक जानवर की तरह कामिनी पर हमला बोल दिया।
उसने कामिनी को दीवार से इतनी जोर से सटाया कि कामिनी की नंगी पीठ ठंडी दीवार से चिपक गई।
"सीइइइ......" कामिनी के मुंह से सिसकी निकल गई।
दीवार बर्फ जैसी ठंडी थी, लेकिन सामने शमशेर का जिस्म भट्टी जैसा गरम था।
शमशेर ने कामिनी के दोनों गालों को अपने मज़बूत पंजों में जकड़ लिया और उसके सूजे हुए होंठों को अपने मुंह में भर लिया।
"म्मम्मम्म... चप्प... चप्प..."
वह उसे चूम नहीं रहा था, वह उसे नोच रहा था। शमशेर की जीभ कामिनी के मुंह को खंगाल रही थी।
मटन और शराब का तीखा नशा कामिनी के मुँह मे घुलने लगा, लार से होता हुआ पेट मे जाने लगा,
एक अजीब सा अहसास था, हल्का सा तीखा, कसैला लेकिन नशीला.
शमशेर का एक हाथ नीचे गया और उसने कामिनी के भरे हुए, भारी स्तन को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
उसने उसे बुरी तरह भींचा, मसला और दबाया।
वह उस गोरे मांस को अपनी उंगलियों में ऐसे गूंथ रहा था जैसे कोई आटा गूंथता है।
"आह्ह्ह्ह... उम्मम्म... धीरे..." कामिनी दर्द और मज़े में सिसक उठी।
शमशेर ने उसके खड़े निप्पल को अपनी उंगलियों में पकड़कर मरोड़ दिया, और फिर अपना मुंह नीचे ले जाकर उस काले निप्पल को अपने दांतों और होंठों में जकड़ लिया।
"स्स्स्लर्प......"
कामिनी का सिर पीछे दीवार से टकरा रहा था।
उसका पूरा जिस्म जल रहा था।
वह बार-बार अपने हाथ नीचे ले जाती, शमशेर के उस खड़े लंड को पकड़ने की कोशिश करती।
उसे उस खंभे की गर्मी अपनी हथेली में चाहिए थी।
लेकिन शमशेर उसे अपना 'लंड ' पकड़ने ही नहीं दे रहा था।
जैसे ही कामिनी का हाथ नीचे जाता, शमशेर उसे पकड़कर वापस दीवार पर पटक देता।
"तड़प...साली रांड " शमशेर उसके कान में गुर्राया, उसके स्तन को और ज़ोर से भींचते हुए।
"अभी और तड़प... जब तक मैं न कहूँ, तू मुझे छुएगी नहीं।"
कामिनी बेबस थी, गंदे शब्द खुद को रांड कहना उसे सुकून दे रहा था, शमशेर का ये जंगलीपना उसे मदहोश कर रहा था, साथ ही यही बेबसी उसे और गीला कर रही थी।
सामने बेड पर उसका पति रमेश बेहोश पड़ा था, और यहाँ दीवार से सटी कामिनी एक गैर-मर्द के हाथों अपनी जवानी लुटवा रही थी, अपने स्तनों को मसलवा रही थी।
उसकी योनि से पानी की धार बह निकली।
वह दर्द और हवस में चिल्ला रही थी—
"आह्ह्ह... शमशेर... मार डालोगे... आह्ह्ह... और ज़ोर से... !!"
बेडरूम की दीवार से सटी कामिनी अब सिर्फ़ मांस का एक टुकड़ा बनकर रह गई थी।
शमशेर, जो अब पूरी तरह 'जानवर' बन चुका था, कामिनी के जिस्म को नोच रहा था।
उसका मुंह कामिनी की गर्दन और स्तनों को चूस रहा था, लेकिन उसके हाथ... उसके हाथ पीछे जाकर कामिनी के सबसे मादक हिस्से के साथ खेल रहे थे।
शमशेर के मज़बूत और खुरदरे पंजे कामिनी की विशाल, नंगी और मुलायम गांड पर गड़ गए थे।
उसने उन दोनों भारी-भरकम कूल्हों (Buttocks) को अपनी मुट्ठी में भरकर बुरी तरह भींचा।
"आह्ह्ह..." कामिनी दर्द से बिलबिला उठी।
"साली... क्या मांस भरा है पीछे..." शमशेर गुर्राया। "आज तेरी यह गांड मारूंगा।"
कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।
उसे याद आया... जब शमशेर पहली बार उनके घर डिनर पर आया था। तब कामिनी साड़ी में थी, और झुककर पानी दे रही थी।
तब शमशेर ने रमेश से हंसते हुए कहा था— "भाई, अगर मेरी बीवी की गांड ऐसी होती, तो कसम से मार-मार के लाल कर देता।"
आज वह डरावनी फैंटेसी हकीकत बनने जा रही थी।
कामिनी को लगा जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख उसके अंदर घुसने वाली है।
शमशेर की उंगलियां उसकी गांड की गहरी दरार (Butt Crack) में रेंगने लगीं।
वह सूखी थी, तंग थी। शमशेर ने अपनी ऊँगली पर थूका और फिर वापस से कामिनी की गांड दरार ने तेराने लगा, शमशेर वहां रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा था।
"न... नहीं... प्लीज..." कामिनी ने तड़पते हुए शमशेर के सीने पर हाथ रखा।
"आअह्ह्ह.... उउउफ्फ्फ्फ़... ये क्या कर रहे हो? मैं तुम्हारे दोस्त की बीवी हूँ शमशेर... होश में आओ।"
कामिनी ने अपनी 'इज़्ज़त' और 'रिश्ते' का वास्ता देकर उसे रोकना चाहा।
यह सुनते ही शमशेर की आँखों में खून उतर आया।
वह रुका नहीं, बल्कि उसने कामिनी के बालों को पकड़कर उसका चेहरा ऊपर खींच लिया।
"दोस्त की बीवी?" शमशेर ने कामिनी की आँखों में झांका।
"साली... रांड... चुप!" शमशेर दहाड़ा।
"हरामखोर... अभी जब उस कादर से, उस दो टके के कसाई से अपनी चुत चटवा रही थी, तब याद नहीं आया कि तू दोस्त की बीवी है? तब तो बड़ा मज़ा आ रहा था तुझे?"
शमशेर का यह कथन सुनते ही कामिनी का जिस्म काठ (लकवा) मार गया।
उसकी गांड की मांसपेशियां, जो कस गई थीं, डर के मारे ढीली पड़ गईं।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, जैसे जिस्म से सारा खून निचोड़ लिया गया हो।
उसकी चोरी पकड़ी गई थी। रंगे हाथों।
अब उसके पास कोई दलील नहीं थी, कोई बहाना नहीं था।
वह शमशेर की नज़रों में अब 'भाभी' नहीं, बस एक 'बिगड़ी हुई रंडी' थी।
शमशेर ने उसकी घबराहट को महसूस कर लिया,
"क्यों? निकल गई हवा?" शमशेर ने एक कुटिल मुस्कान दी।
"शुक्र मना कि तू मेरे दोस्त की बीवी है, इसलिए यहाँ बेडरूम में प्यार से पेश आ रहा हूँ। वरना जैसी हरकत तूने की है ना... तुझे तो भरे बाज़ार में नंगा करके चोदता।"
शमशेर का चेहरा गुस्से और उत्तेजना से लाल टमाटर हो रहा था। उसका खूंखार पुलिसिया रूप अब पूरी तरह बाहर आ चुका था।
कामिनी अभी सदमे में थी, कुछ सोच ही नहीं पा रही थी।
तभी शमशेर ने एक्शन लिया।
उसने कामिनी के बालों को मुट्ठी में जकड़ा और उसे एक झटके से बिस्तर की तरफ धकेल दिया।
"चल... झुक जा अपने खसम के सामने।"
शमशेर ने उसे ठीक उसी जगह झुकाया जहाँ रमेश बेहोश पड़ा था।
रमेश का मुंह खुला था, और उसके होंठों से थूक (लार) बहकर तकिये पर गिर रही थी।
कामिनी अपने ही पति के चेहरे के सामने, उसके बिल्कुल पास, घुटनों और कोहनी के बल (Doggy Style) आ गई।
उसकी आँखों के सामने रमेश का बेहोश चेहरा था।
उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी, ग्लानि (Guilt) हो रही थी...
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म इस अपमान और जबरदस्ती पर पागलों की तरह प्रतिक्रिया दे रहा था।
डर के बावजूद, उसकी योनि अभी भी कादर की याद में और अब शमशेर के डर में पानी छोड़ रही थी।
जैसे ही कामिनी झुकी, शमशेर के सामने जो मंज़र पेश हुआ, वह किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने वाला था।
कामिनी की विशाल, गोरी और मखमली गांड हवा में ऊपर उठ गई।
ट्यूबलाइट की रौशनी सीधे उस 'गुलाबी घाटी' पर पड़ रही थी।
नीचे लटकती हुई उसकी योनि के गुलाबी होंठ (Lips) साफ़ दिख रहे थे। वे सूजे हुए थे और गीले थे।
उनमें से एक महीन लकीर में पारदर्शी पानी (Kamras) रिस रहा था, जो उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से को भिगो रहा था। वह गुफा कादर के जाने के बाद से खाली थी और अब भरने के लिए चीख रही थी।
और उसके ठीक ऊपर... वह छोटा, तंग और भूरा-गुलाबी छेद (Anus)।
गांड के पाटों के फैलने से वह छेद बिल्कुल नुमाया (Exposed) हो गया था।
कामिनी के डर और उत्तेजना की वजह से वह छेद "लपक" रहा था।
जैसे उसे समझ नहीं आ रहा हो कि वह शमशेर के लंड के स्वागत के लिए खुले, या अपनी सुरक्षा के लिए बंद हो जाए।
वह "खुल-बंद" होता हुआ छेद शमशेर को सीधा निमंत्रण दे रहा था— "आओ और मुझे फाड़ दो।"
शमशेर उस नज़ारे को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
उसका खड़ा लंड पैंट को फाड़ने पर उतारू था।
"उफ्फ्फ्फ... साली..." शमशेर बड़बड़ाया।
"साला रमेश ऐसा नसीब पा कर भी बहार मुँह मारता रहा... शमशेर मन ही मन बड़बड़या,
ट्यूबलाइट की रौशनी में वह तंग, सिकुड़ता हुआ और गुलाबी छेद (Anus) उसे चुम्बन के लिए बुला रहा था।
वह नज़ारा इतना मादक था कि शमशेर का सारा पुलिसिया संयम, सारी सभ्यता धरी की धरी रह गई।
उसे अब लंड डालने की जल्दी नहीं थी... उसे उस "वर्जित फल" को चखना था।
शमशेर ने आव देखा न ताव।
उसने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी के गांड के दोनों पाटों (Butt Cheeks) को पकड़कर और कसकर चौड़ा कर दिया।
और अगले ही पल...
"चटाक...!!"
उसके खुरदरे गाल और दाढ़ी कामिनी के मुलायम कूल्हों से टकराए।
और शमशेर की मोटी, चौड़ी और खुरदरी जीभ सीधे निशाने पर लगी—कामिनी के गांड के छेद पर।
"आअह्ह्ह.... आउच.... उउउफ्फ्फ्फ़...!!"
कामिनी के मुंह से एक बेकाबू चीख निकल गई।
उसका पूरा शरीर बिजली का झटका खाकर कांप उठा (Convulsed)।
वह बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भींचकर ऐंठ गई।
यह स्पर्श... यह हमला... उसने अपनी ज़िंदगी में, अपने सपनों में भी नहीं सोचा था।
शमशेर की जीभ गरम लोहे की तरह थी, लेकिन गीली और रसीली।
शमशेर ने अपनी जीभ की नोक को सुई की तरह कड़ा किया और उसे कामिनी के तंग छेद (Sphincter) पर गोल-गोल फिराने लगा।
"स्स्स्लर्प... लप... लप... लप..."
कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं, जो रमेश के खर्राटों को भी दबा रही थीं।
कामिनी का डर, उसकी हया, उसकी कुलीनता... सब इस एक स्पर्श के साथ हवा हो गए।
उसका जिस्म हवस की आग में दहक उठा।
यह मज़ा योनि के मज़े से बिल्कुल अलग था। यह गहरा था।
कामिनी को महसूस हुआ कि शमशेर की जीभ सिर्फ़ उसकी चमड़ी को नहीं चाट रही।
जैसे-जैसे शमशेर अपनी थूक से उस सूखे छेद को गीला कर रहा था और अपनी जीभ को अंदर धकेलने की कोशिश कर रहा था...
कामिनी को लगा जैसे गांड के उस छेद से होती हुई कोई बारीक नस (Nerve) सीधे उसके दिल से जुडी है।
शमशेर का हर एक 'चाट'... उसके दिल को अंदर से गुदगुदा रही थी, झिंझोड़ रहा थी.
"उफ्फ्फ्फ... शमशेर... आह्ह्ह्ह... यह क्या... उईईई माँ..."
कामिनी का सिर तकिये में धंस गया।
वह किसी मादा भेड़िया की तरह हुंकार उठी।
उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई और अनजाने में उसने अपनी गांड को और पीछे धकेल दिया—सीधे शमशेर के मुंह पर।
यह एक मूक सहमति थी— "और चाटो... और अंदर तक..."
शमशेर समझ गया कि नशा चढ़ गया है।
उसने कामिनी की जांघों के बीच से बहते हुए पानी (Vaginal Juice) को अपनी उंगलियों पर लिया और उसे कामिनी के गांड के छेद पर लगा दिया।
और फिर उसने अपनी जीभ को चपटा करके उस पूरे इलाके को एक आइसक्रीम की तरह चाटना शुरू किया।
वह अपनी नाक को कामिनी के कूल्हों के बीच रगड़ रहा था, उसकी कस्तूरी (Musk) जैसी गंध को सूंघ रहा था।
कामिनी की मनोदशा अब किसी जानवर जैसी हो गई थी।
उसे अब यह नहीं याद था कि वह किसकी बीवी है, या सामने कौन है।
उसे बस वह "गीलापन" और वह "गरमाहट" चाहिए थी।
उसकी गांड का छेद, जो पहले डर से बंद था, अब मज़े में ढीला पड़ने लगा था... शमशेर के स्वागत के लिए खुलने लगा था।
शमशेर ने अपना मुंह हटाया, उसकी दाढ़ी कामिनी के रसों से सनी हुई थी।
उसने कामिनी की कांपती हुई गांड पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।
"चटाक!!"
"साली... स्वाद आ गया..." शमशेर गुर्राया।
" अब हुई ना तैयार तेरी गुफा.."
शमशेर अब रुकने वाला नहीं था। कामिनी की गांड चाटने के बाद उस पर हवस का नशा पूरी तरह हावी हो चुका था।
उसने एक हाथ से अपनी बेल्ट का बक्कल पहले ही खोल रखा था।
अब उसने एक ही झटके में अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को घुटनों से नीचे सरका दिया।
पैंट के नीचे गिरते ही उसका विशाल, काला और नसों भरा लंड पूरी तरह आज़ाद हो गया।
वह हवा में ऐसे डोल रहा था जैसे कोई भूखा और गुस्से में भरा कोबरा (सांप) अपना फन फैलाए शिकार ढूंढ रहा हो।
वह 'सांप' फनफना रहा था, उसका लाल टोप (Suapada) सूजा हुआ था और वह अपना बिल (कामिनी की गांड) तलाश रहा था।
शमशेर ने कामिनी की कमर को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया।
उसने अपने उस बेचैन सांप को दिशा दिखाई।
शमशेर ने अपने लंड को मुट्ठी में भरा और उसे कामिनी की गीली और खुली हुई गांड की दरार पर रख दिया।
उसने लंड को ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू किया।
"स्लप... स्लप..."
कामिनी उस झुलसा देने वाली गर्मी से सिहर उठी।
उसे पता चल गया कि अब 'मौत या मजा दरवाज़े पर खड़ा है।
उसमें अब विरोध करने की न तो हिम्मत बची थी, और सच कहें तो... न ही इच्छा।
उसका शरीर उस कठोर दंड को पाने के लिए तैयार हो गया।
सामने बिस्तर पर रमेश बेहोश पड़ा था।
कामिनी ने झट से रमेश की शर्ट का कॉलर अपनी मुट्ठी में भरा और उसे अपने मुंह में ठूंस लिया।
उसने अपने जबड़े भींच लिए, ताकि उसकी चीखें बाहर न जा सकें।
उसने अपनी गांड को हल्का सा पीछे धकेला, अनजाने में ही शमशेर को इशारा कर दिया।
उसकी गांड का वह छोटा सा, गुलाबी छेद बाहर की तरफ (Prolapse) खुलने लगा, जैसे कह रहा हो— "आओ, मुझे भर दो।"
शमशेर ने अब और इंतज़ार नहीं किया।
उसने अपने लंड के विशाल, मशरूम जैसे टोपे (Glans) को कामिनी की गांड के ठीक मुहाने पर सेट किया।
वह छेद बहुत छोटा था, और टोप बहुत बड़ा।
शमशेर ने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और अपनी कमर को आगे की तरफ धकेला।
एक धीमा लेकिन ताकतवर दबाव।
कामिनी की गांड की मांसपेशियां (Sphincter) खिंचने लगीं।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, पुतलियां फैल गईं। उसने रमेश की शर्ट को दांतों तले दबा लिया।
"तड़ड़ड़......"
गांड की चमड़ी तनने लगी। लंड का मोटा टोप उस तंग रास्ते को जबरदस्ती चौड़ा कर रहा था।
"खचाक.....!!"
एक गीली और भारी आवाज़ के साथ शमशेर ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।
मेहनत रंग लाई।
शमशेर के लंड का वह मोटा, लाल और विशाल टोप कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़ता हुआ अंदर घुस गया।
"आआआआआहहहहह...... उउउउफ्फ्फ्फ़.... म्म्म्म्म्प्पप्प.....!!!"
कामिनी की चित्कार निकल गई।
उसे लगा जैसे किसी ने गरम लोहे की कील उसकी गांड में ठोक दी हो।
उसका सिर झटके से ऊपर उठा, नसे तन गईं।
लेकिन रमेश की शर्ट ने उसकी उस गगनभेदी चीख को घोंट दिया।
और ठीक उसी पल...
जैसे ही वह विशाल लंड गांड के अंदर घुसा और उसने अंदर के अंगों (Bladder/G-Spot) पर ज़बरदस्त दबाव बनाया...
कामिनी का शरीर अपना नियंत्रण खो बैठा।
उसकी चुत, जो पहले से ही गीली थी, लंड के इस अचानक हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाई।
"सर्ररररर...... पिच....पाचककक ससससररर......!!"
कामिनी की चुत से पेशाब और उत्तेजना के पानी की एक तेज़ धार (Squirt) फव्वारे की तरह छूट गई।
वह धार सीधे बिस्तर पर गिरी, बिस्तर की चादर गीली हो गई।
ऐसा लगा जैसे कामिनी के शरीर ने शमशेर के लंड के लिए जगह खाली की हो।
वह नज़ारा अद्भुत था।
पीछे एक मर्द उसकी गांड मार रहा था, और आगे से वह औरत झड़ (Squirt) रही थी।
शमशेर ने उस गीलेपन को देखा और पागल हो गया।
"साली... मूत दिया तूने?" शमशेर हांफते हुए हंसा। "ले अब पूरा ले..."
और उसने अपना बाकी का 8 इंच का तना भी अंदर उतारना शुरू कर दिया।
शमशेर का विशाल लंड का 'सुपाड़ा' (Topa) कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़कर अंदर घुस चुका था।
शुरुआत में तो लगा जैसे कामिनी की गांड फट गई हो, लेकिन जैसे ही शमशेर ने रुकने के बजाय धीरे-धीरे कमर चलानी शुरू की, मंज़र बदलने लगा।
"स्लप... चप... स्लप..."
गीली थूक और कामिनी के रसों की वजह से लंड चिकना होकर अंदर-बाहर होने लगा।
शमशेर ने बहुत सधे हुए अंदाज़ में छोटे-छोटे धक्के मारने शुरू किए।
वह अपने लंड को आधा बाहर खींचता, और फिर धीरे से वापस अंदर ठेल देता।
इस रगड़ ने कामिनी के अंदर एक नया ही तूफ़ान खड़ा कर दिया।
वह गांड, जो कुछ पलों पहले दर्द से चीख रही थी, अब उस 'भराव' (Fullness) को महसूस करके पागल होने लगी।
कामिनी को महसूस हुआ कि उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) शमशेर के लंड को किसी रबर बैंड की तरह जकड़ रही हैं, उसे चूम रही हैं।
दर्द पल भर में ही उत्तेजना में तब्दील होने लगा।
उसे अपनी नाभि के नीचे, पेट की गहराई में एक मीठा-मीठा दर्द और भारीपन महसूस हुआ।
यह चुत के मज़े से ज्यादा गहरा और नशीला था।
कामिनी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांड मरवाने में भी इतना मज़ा है। वह उस 'भरने' के अहसास की गुलाम हो गई।
उसने रमेश की शर्ट को मुंह से थूक दिया और दबी हुई आवाज़ में सिसकी—
"आह्ह्ह... शमशेर... और... और अंदर..."
उसने अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेला।
वह चाहती थी कि वह मोटा सांप उसकी आंतों तक घुस जाए। वह अब और लंड मांग रही थी।
शमशेर ने यह इशारा समझ लिया।
"साली... स्वाद आ गया तुझे भी?" शमशेर हांफते हुए हंसा।
उसने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और मौका देखकर एक ज़ोरदार धक्का मारा।
"धप्प...!!"
शमशेर का लंड, जो अब तक सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर डाले हुए था, अब आधा (Half Shaft) अंदर चला गया।
कामिनी की आँखें पलट गईं। उसे लगा वह जन्नत में है।
वे दोनों अपनी लय (Rhythm) पकड़ने ही वाले थे।
कामिनी और लंड लेने के लिए पीछे धकेल रही थी, और शमशेर पूरा अंदर डालने के लिए जोर लगा रहा था।
तभी...
अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक तेज़ और डरावनी आवाज़ बेडरूम में गूंज उठी।
"वी... वू... वी... वू... वी... वू...!!!!"
(Police Siren Wailing Loudly)
आवाज़ इतनी तेज़ और नज़दीक थी कि लगा पुलिस की जीप सीधे बेडरूम के अंदर घुस आई है।
और आवाज़ के साथ ही...
बेडरूम की खिड़की के पर्दे पर लाल और नीली रौशनी (Red & Blue Lights) चमकने लगी।
पर्दे से छनकर आती वह घूमती हुई रौशनी पूरे कमरे में डिस्को लाइट की तरह नाचने लगी—कभी कामिनी की नंगी पीठ पर लाल, तो कभी शमशेर के चेहरे पर नीला।
कामिनी और शमशेर बुरी तरह डर गए।
उनका नशा एक सेकंड में हिरन हो गया।
कामिनी, जो अभी मज़े में झूम रही थी, अब खौफ से कांप उठी।
"हय राम! ये... ये क्या हुआ? इतनी रात को पुलिस?" कामिनी बड़बड़ाई।
वह किसी खूंटे से बंधे जानवर की तरह छटपटाने लगी। उसे लगा अब सब ख़त्म। इज़्ज़त, घर, सब कुछ।
लेकिन असली मुसीबत तो अब शुरू हुई।
पुलिस के सायरन की आवाज़ सुनकर शमशेर का, जो एक पुलिस वाला ही था, डर के मारे बुरा हाल हो गया।
डर का सीधा असर उसके लंड पर पड़ा।
उसका वह लोहे जैसा खड़ा लंड, जो कामिनी की गांड में आधा घुसा हुआ था, अचानक सिकुड़ने लगा। वह ढीला पड़ गया।
शमशेर ने हड़बड़ाहट में अपना लंड बाहर खींचना चाहा।
लेकिन यहाँ फिजिक्स ने खेल कर दिया।
कामिनी भी डरी हुई थी। डर के कारण उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) बुरी तरह सिकुड़ गईं।
उसकी तंग गांड ने शमशेर के आधे-अधूरे और अब ढीले पड़ते हुए लंड पर एक वैक्यूम बना दिया।
शमशेर अपना लंड बहार खींच रहा था, लेकिन लंड बाहर नहीं आ रहा था।
उसका सुपाड़ा (Topa) अंदर बुरी तरह फंस (Stuck) गया था।
"अरे... अरे... छोड़ इसे..." शमशेर फुसफुसाया, पसीने से तर-बतर होकर।
"आआआआह्हः..... बहार निकालो इसे... हाय माँ..." कामिनी सिसक उठी।
शमशेर ने एक हाथ कामिनी की कमर पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी जांघ पर जोर दिया।
उसने एक झटका मारा।
"इइइइ... पप्पाप्प... पुककक...!!" (PLUCK!)
एक गीली और अजीब सी आवाज़ आई, जैसे किसी ने शैंपेन की बोतल का कॉर्क (Cork) खोला हो, या कीचड़ में फंसा पैर बाहर निकाला हो।
शमशेर का लंड झटके से बाहर निकल आया।
उसका सुपाड़ा लाल था और उस पर कामिनी की गांड की गीलापन लगा हुआ था।
कामिनी को ऐसा लगा जैसे उसकी गांड का छेद बाहर की तरफ पलट गया हो।
उसे महसूस हुआ कि उसका दिल और कलेजा उस रास्ते से बाहर खिंच आया है।
उसकी गांड का छेद अब खुला (Gaping) रह गया था, जो हवा में "धक्-धक्" कर रहा था।
दर्द और खिंचाव ने उसकी आँखों में आंसू ला दिए।
लंड के निकलते ही शमशेर तुरंत पीछे हटा।
उसने आव देखा न ताव, अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को जल्दी-जल्दी ऊपर चढ़ाया।
उसकी हालत पतली थी। उसका लंड अब पूरी तरह सिकुड़कर केंचुआ बन गया था।
उसने बेल्ट लगाई भी नहीं, बस हाथ में पकड़ ली।
"मै... मैं देखता हूँ बाहर क्या है..." शमशेर ने हकलाते हुए कहा। "शायद रेड है... तुम... तुम जल्दी से कपड़े पहन लो।"
शमशेर ने रमेश की तरफ इशारा किया।
"और इस चूतिये को... रमेश को जगाओ! जल्दी!"
कामिनी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
वह नंगी थी, पसीने से लथपथ थी, उसकी गांड और योनि से पानी बह रहा था।
बाहर लाल-नीली बत्ती चमक रही थी।
उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी और पेटीकोट को उठाया जो ज़मीन पर पड़े थे।
उसने उन्हें लपेटा नहीं, बस अपने आगे पकड़ लिया।
वह रमेश के पास गई और उसे झिंझोड़ने लगी।
"उठो... उठो रमेश... प्लीज उठो..." कामिनी की आवाज़ में रुलाई थी।
"देखो बाहर पुलिस आई है... उठो ना!"
रमेश नशे में "हूं... हां..." कर रहा था, उसे खबर ही नहीं थी कि उसकी बीवी की गांड अभी-अभी मारी गई है और घर के बाहर पुलिस खड़ी है।
तभी बाहर से मेगाफोन (Loudspeaker) पर आवाज़ आई—
"बंगला नंबर 69! पुलिस ने घर को चारों तरफ से घेर लिया है। जो भी अंदर है, हाथ ऊपर करके बाहर आ जाओ!"
आवाज़ किसी और की नहीं, कमिश्नर विक्रम सिंह की थी।
शमशेर का खून जम गया।
(क्रमशः)












1 Comments
Bhai yaar saspens pe hi chod diya thoda aur likhte maja aa jata wase bhaut badiya likha h maja aa gaya agla update jaldi dena thanks
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