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कामिनी 2.0 भाग -11

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय 11

रात का सन्नाटा गहरा चुका था। हवेली की विशाल दीवारें अब किसी रहस्यमयी साये की तरह लग रही थीं। कमरे के भीतर कामिनी और फागुन सुकून की नींद सो चुके थे। कामिनी की रूह को बंटी की बातों से तसल्ली मिली थी, तो फागुन के जिस्म को बंटी के स्पर्श से पहली तृप्ति।
आँगन में बिछी चारपाई पर बंटी लेटा हुआ था। आसमान में बिखरे सितारे उसकी आँखों में चमक रहे थे, लेकिन नींद कोसों दूर थी। उसके बंद आँखों के सामने बार-बार फागुन का वो भीगा हुआ बदन, वो कड़क स्तन और हौद के पानी में हुई वो पहली हलचल घूम रही थी। वह उस अहसास को दोबारा जीने की कोशिश कर रहा था।
तभी... 'चरररर्रर्र..... धाड़!'

हवेली के मुख्य लोहे के दरवाज़े के खुलने की भारी आवाज़ हुई। बंटी एक झटके में चौंक कर उठा। उसने देखा कि उसका बाप, रमेश, सीने से एक काला बैग चिपकाए हुए लड़खड़ाता, लहराता और नशे में धुत चला आ रहा था। बंटी ने बिजली की फुर्ती दिखाई और अपनी चादर ओढ़कर सोने का नाटक करने लगा।

रमेश के जूतों की आवाज़ बंटी की चारपाई के करीब से गुज़री। वह सीधा घर के अंदर दाखिल हुआ। बंटी ने एक आँख खोलकर देखा और दबे पाँव, बिल्ली की तरह बिना आवाज़ किए रमेश के पीछे हो लिया।
रमेश सीधा ताईजी के कमरे के बाहर जाकर रुका। उसके हाथ नशे में कांप रहे थे, लेकिन उसने अपनी जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला और ताला टटोलने लगा। 'खटाक' से ताला खुला और रमेश अंदर घुस गया। उसने दीवार पर लगा स्विच दबाया, और कमरे का पुराना पीला बल्ब टिमटिमाते हुए जल उठा।

बंटी दरवाज़े के पास छिपकर अंदर का नज़ारा देख रहा था। उसके दिमाग में एक ही सवाल था "आधी रात को ये बुड्ढा ताईजी के कमरे में क्या कर रहा है?"

कमरे के कोने में एक विशाल सागवान की अलमारी थी। रमेश ने उसके पल्ले खोले, अंदर रखे कुछ पुराने कपड़े हटाए और दीवार के सहारे लगे एक गुप्त लोहे के हुक को ज़ोर लगाकर घुमाया।
बंटी की आँखें फटी की फटी रह गईं। अलमारी के पीछे की दीवार, जो असल में लकड़ी की एक बहुत ही बारीक नक्काशी थी, खिसकती चली गई। दीवार के हटते ही अंधेरे की तरफ जाती हुई संकरी सीढ़ियाँ दिखने लगीं।

"हिच.... साला.... हिचम... पैसे से बड़ा नशा कुछ नहीं ...!" रमेश लड़खड़ाते हुए उस काले बैग को सीने से लगाए उन सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।
बंटी दीवार से चिपका हुआ यह सब देख रहा था। उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।

"अबे! ये क्या है बे?" बंटी ने मन ही मन बुदबुदाया। "ताईजी के कमरे में ये गुप्त तहखाना? साला... ना मेरा बाप सीधा है और ना ही इसके ये रिश्तेदार। इस हवेली के अंदर तो कोई और ही दुनिया बसी हुई है।"

बंटी का मन किया कि अभी नीचे जाकर देखे कि वहाँ क्या है, लेकिन वक़्त अभी सही नहीं था, रमेश नशे मे बहुत ज्यादा खूंखार हो जाता है, 

बंटी फुर्ती से पीछे हटा, दबे पाँव आँगन में आया और अपनी चारपाई पर ऐसे लेट गया जैसे वह गहरी नींद में हो। लेकिन उसका दिमाग अब 100 की रफ्तार से दौड़ रहा था। 
बहुत कुछ था जो अभी सामने आना बाकि था.
***********************




सुबह 7:00 बजे | गाँव की चाय की दुकान

सूरज की सुनहरी किरणें खेतों की हरियाली पर पड़ रही थीं। गाँव अपनी पूरी रफ़्तार पकड़ चुका था, बैलों के गले की घंटियाँ और पंछियों का शोर हवा में गूँज रहे थे, 

 लेकिन गाँव के इस सुकून से दूर, बाज़ार के कोने में एक चाय की दुकान पर दो 'जोकर' अपनी नाकामियों का ज़हर पी रहे थे।
"साला! इन गाँव के लोगों को इतनी सुबह-सुबह जाना कहाँ होता है यार? चैन से सोने भी नहीं देते," लकी ने अपनी लाल आँखें मलते हुए चिढ़कर कहा। वो आधी नींद में था और रात भर की थकान उसके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी।

"हाँ यार, ठीक से सोए भी नहीं कितने दिन से। हड्डियों में दर्द होने लगा है," बिट्टू ने उँघते हुए जवाब दिया।

लकी का सब्र अब जवाब दे रहा था। उसने अपनी बेल्ट में फँसी पिस्तौल की मुठ पर हाथ रखा और दाँत पीसते हुए बोला, "अब बस बहुत हुआ! आज उस साली औरत के सर पर बंदूक लगाते हैं और उठा लाते हैं। बहुत देख लिया।"

"अबे... ईस्स्स.... ईस्स्स.... धप!" बिट्टू ने एक ज़ोरदार घूँसा लकी की पीठ पर जमाया। "पागल हो गया है क्या? दिमाग से काम ले बे! ऐसे कैसे उठा लेगा? ये गाँव वाले मार-मार कर भूर्ता बना देंगे। कल बैठक में सुना नहीं था?

 उस मरी हुई बुढ़िया (ताईजी) का कितना मान-सम्मान है यहाँ। उसकी बहू को हाथ लगाया तो पूरा गाँव हमें ज़िंदा गाड़ देगा।"
"तो क्या करें यार? हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें?" लकी हताश होकर चाय के गिलास को घूरने लगा।

"जल्दी चाय पी... आज मौका देखते हैं।," बिट्टू ने सुड़क... सुड़क... करते हुए चाय खत्म की। आज उनके इरादे पत्थर की तरह मज़बूत थे।


दूसरी तरफ, हवेली के आँगन में नज़ारा बिल्कुल अलग था। रात को तहखाने में 30 लाख सहेजने के बाद आज रमेश के चेहरे पर एक अजीब सी रौनक और 'सज्जनता' छाई हुई थी। आँगन में बिछी चारपाई पर सब साथ बैठे चाय पी रहे थे।
रमेश आज पूरी तरह 'फैमिली मैन' बना हुआ था। उसने चाय की चुस्की ली और मुस्कुराते हुए कामिनी की तरफ देखा। "गाँव पसंद आ रहा है कामिनी?"

कामिनी जानती थी रमेश का स्वभाव ऐसा ही है, सुबह बिल्कुल सज्जन फॅमिली मेन होता है और रात मे भूखा भेड़िया.
 "हाँ... अच्छा है।"

"हम्म्म... देख रहा हूँ यहाँ आकर तुम्हारे गाल और भी लाल हो गए हैं। शहर की भागदौड़ से तो ये ताज़ा हवा बेहतर है ना?" रमेश बड़े प्यार से पेश आ रहा था। रमेश का यही दोहरा व्यक्तित्व कामिनी के लिए सबसे बड़ी पहेली था। सुबह वो एक ज़िम्मेदार और प्यार करने वाला पति होता, लेकिन सूरज ढलते ही और गले के नीचे दारू उतरते ही कामिनी पर हाथ उठाता.

"आप भी ना....." कामिनी ने नज़रें झुकाकर हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन उसके अंदर एक डर अब भी बैठा था।
"अच्छा सुनो! आज रात को सरपंच जी के घर जाना है दावत पर। तैयार रहना, फौजा सिंह ने खास तौर पर बुलाया है," रमेश ने अधिकार के साथ कहा।

"आज? आज ही? वो... वो... थोड़ा दर्द है पैर में," कामिनी ने अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर उठा कर अपनी गोरी एड़ी दिखाई। सूजन तो नहीं थी, लेकिन उस गोरी त्वचा पर एक हल्की सी लालिमा थी, जो शायद कल कि व्यस्तता का नतीजा थी 
उसे आज फिर से वहीं एक मीठा सा दर्द महसूस हो रहा था।

"ठीक तो है, दवाई ले लेना," रमेश ने लापरवाही से कहा। "और थोड़ा घूमो-फिरो, सारा दिन बैठे रहने से दर्द बढ़ेगा ही। ताऊजी! इन सबको आज खेत-खलिहान दिखा लाओ। बंटी और कामिनी को भी पता चले हमारी ताईजी क्या क्या छोड़ गई है।"

ताऊजी ने सिर हिलाया, "ठीक रमेश बाबू, दिखा लाएँगे। गाँव की आब-ओ-हवा शरीर की सारी सुस्ती खींच लेती है।"

कामिनी लंगड़ाते हुए अपने कमरे में आई। एड़ी का वो दर्द अब धीरे-धीरे उसकी पूरी टांग में चढ़ रहा था। जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा, मेज़ पर रखी उस पीली दवा की शीशी पर उसकी नज़र पड़ी। शीशी को देखते ही कामिनी के वजूद में एक बिजली सी कौंध गई। उसकी आँखों के सामने हकीम का वो झुर्रियों वाला चेहरा और उसकी खुरदरी उँगलियों का वो स्पर्श घूम गया,

"बूढ़ा काम का नहीं था, लेकिन उसकी दवा में दम है," कामिनी ने मन ही मन सोचा। उसे याद आया कि उस रात मालिश और दवा के बाद उसका जिस्म कैसे रुई की तरह हल्का हो गया था।

कामिनी ने कांपते हाथों से शीशी उठाई और पास रखे पानी के गिलास में ठीक 5 बूंदें टपका दीं। पानी का रंग हल्का दूधिया हो गया। उसने एक गहरी साँस ली और गट.. गट... गटाक....करके पूरा गिलास खाली कर दिया। दवा गले के नीचे उतरते ही उसे महसूस हुआ कि उसके खून में एक मीठी सी गर्मी दौड़ने लगी है। 
दर्द का अहसास कम होने लगा और उसकी जगह एक हल्की सी मदहोशी ने ले ली। "अब नहा लेना चाहिए," उसने बुदबुदाते हुए अपना तौलिया उठाया, उसके चेहरे पर अब एक अजीब सा सुकून और हल्की सी मुस्कान थी।

बाहर आँगन के कोने में फागुन खड़ी थी, उसका चेहरा किसी मुरझाए हुए फूल की तरह लटका हुआ था। वह रह-रहकर अपने दुपट्टे के कोने को मरोड़ रही थी। बंटी ने उसे देखा तो उसके पास पहुँच गया।
"क्या हुआ फागुन? चेहरे पर 12 क्यों बजे हैं?" बंटी ने शरारत से पूछा।
"कुछ नहीं... 12 क्या बजेंगे! तुम तो आज शाम को माँ जी के साथ सरपंच बाबा के घर जा रहे हो ना," फागुन ने मुँह फुलाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अकेलापन साफ़ झलक रहा था जो बंटी के दूर जाने के ख्याल मात्र से पैदा हुआ था।

"अरे बुद्धू! दावत पर जा रहा हूँ, वहाँ हमेशा के लिए रहने थोड़े ही जा रहा हूँ," बंटी ने उसे चिढ़ाया।
"वो बात नहीं है बंटी... आज गाँव के दूसरे छोर पर मेला लगा है। साल में एक बार लगता है। सोचा था आज साथ चलेंगे घूमने, लेकिन...." फागुन ने लंबी साँस ली।

"अरे वाह! गाँव का मेला?" बंटी की आँखों में चमक आ गई। "झूले, चाट-पकौड़ी और वो गाँव वाली भीड़? उउफ्फ्फ... मज़ा आ गया सुनके ही!"
"लेकिन वो दावत...?" फागुन अभी भी असमंजस में थी। उसे लग रहा था कि बंटी अपने बाप की बात नहीं टालेगा।

बंटी ने एक कदम आगे बढ़ाया और फागुन की आँखों में देखते हुए बोला, "गोली मारो दावत को! दावतें तो रोज़ होती हैं। लेकिन गाँव का मेला रोज़-रोज़ थोड़ी ना देखने को मिलता है। तुम तैयार रहना, हम मेले चलेंगे!"
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दोपहर के 12 बज रहे थे, लेकिन सूरज आज बादलों की ओट में कहीं छिप गया था। मौसम ने अचानक करवट ली थी, गर्मी का नामोनिशान नहीं था और ठंडी, नम हवाएँ खेतों की सोंधी महक लेकर आ रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो कुदरत खुद इस सैर के लिए कोई नया ताना-बाना बुन रही हो।

कामिनी नहाकर तैयार हो चुकी थी। उस पीली दवा का असर अब उसके खून में पूरी तरह घुल चुका था, जिससे उसके चेहरे पर एक गजब की लाली और आँखों में हल्की सी खुमारी छा गई थी। उसने एक सफेद रंग की महीन सूती साड़ी पहनी थी, जिस पर नीले फूलों की नक्काशी थी। स्लीवलेस ब्लाउज से बाहर निकलते उसके सुडौल, गोरे हाथ और कन्धों की चमक उस सादे पहनावे में भी किसी बिजली की तरह कौंध रही थी।

"बहु.... बहुरानी! कहाँ रह गई? चलो अब देर हो रही है," बाहर आँगन से ताऊजी ने आवाज़ लगाई।
"आई ताऊजी....!" कामिनी ने खिड़की के शीशे में खुद को एक आखिरी बार निहारा और कमरे से बाहर निकल आई।
जैसे ही कामिनी आँगन में आई, ताऊजी के हलक में जैसे ज़बान अटक गई। बुढ़ापे की ढलती दहलीज़ पर खड़े ताऊजी ने आज से पहले हुस्न का ऐसा सैलाब कभी नहीं देखा था। कामिनी का वो निखरा हुआ गोरा बदन उस ठंडे मौसम में भी आग लगा रहा था। 

कहीं वापस से मोच ना आ जाये इसलिए कामिनी बहुत धीमे और सधे हुए कदमों से चल रही थी, जिससे उसके जिस्म का हर उभार और भी स्पष्ट होकर उभर रहा था।
बंटी और फागुन अपनी ही मस्ती में चूर, पहले ही पगडंडी पर जाकर खड़े हो चुके थे। दोनों आपस में गुफ्तगू कर रहे थे, शायद मेले की प्लानिंग में व्यस्त थे।
"चलिए ताऊजी," कामिनी ने मुस्कुराते हुए कहा और आगे बढ़ गई।

ताऊजी उसके पीछे-पीछे चलने लगे, लेकिन उनकी नज़रें ज़मीन पर नहीं, बल्कि कामिनी की कमर के नीचे वाले हिस्से पर गड़ी थीं जो साड़ी के भीतर आज़ाद होकर मटक रहा था। कामिनी की धीमी चाल की वजह से उसकी गदराई हुई गांड साड़ी के महीन कपड़े के अंदर एक मादक लय में डोल रही थी।

 ताऊजी के बूढ़े जिस्म में एक करंट सा दौड़ गया और उनके मुँह में लार भर आई। वो बार-बार अपनी नज़रें हटाने की कोशिश करते, लेकिन कामिनी का वो मदहोश कर देने वाला पिछवाड़ा उन्हें बार-बार अपनी तरफ खींच लेता 

"बंटी....!" कामिनी ने अपने बेटे को पुकार कर कुछ कहना चाहा, लेकिन ताऊजी ने बीच में ही बात काट दी।
"जाने दो बहुरानी... जवान बच्चे हैं, तेज़ी में रहते हैं। 

 ताऊजी ने बड़े ही 'हितैषी' अंदाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।
"तुम्हारा पैर ठीक है अब? कल तो बहुत दर्द बता रही थी तुम," ताऊजी ने कामिनी के थोड़ा और करीब आते हुए पूछा।
"हनन... हाँ... अब ठीक है ताऊजी," कामिनी ने जवाब दिया और गहरी साँस ली।
ठंडी हवा का एक झोंका उसके खुले कंधों और स्लीवलेस बाहों से टकराया, तो उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसे इस खुलेपन और आज़ादी में एक अजीब सा सुकून मिल रहा था। चारों तरफ लहलहाते हरे खेत, ठंडी हवा और दवा का वो हल्का सा नशा... कामिनी को महसूस हो रहा था कि वो आज पहली बार किसी बंधन से आज़ाद होकर इस गाँव की मिट्टी को महसूस कर रही है।


खेतों का सन्नाटा अब और भी गहरा हो गया था। बंटी और फागुन की खिलखिलाती आवाज़ें अब बहुत पीछे छूट चुकी थीं। चारों तरफ सिर्फ हवा के चलने से बाजरे के पत्तों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

"वो देखिये बहुरानी, ये समरवेल है। यहीं से पूरे खेतों में पानी जाता है," ताऊजी ने पास ही बनी ईंटों की उस ऊँची होद की तरफ इशारा किया जहाँ से पानी की एक छोटी नहर निकलकर खेतों की प्यास बुझा रही थी।
कामिनी आगे बढ़ी। उसके सामने लहलहाते बाजरे के ऊँचे खेत थे जो कद में किसी आदमी से भी ऊँचे हो चुके थे। उन खेतों के बीच से गुज़रती संकरी पगडंडी किसी रहस्यमयी दुनिया की ओर ले जाती लग रही थी।

 "Wow! कितना सुंदर है ये सब," कामिनी के मुँह से अनायास ही निकला।
"और वो दूर जो झोपड़ी जैसा दिख रहा है, वो समझो मेरा ठिकाना है। यहीं पड़ा रहता हूँ दिन भर... खेतों की रखवाली और काम करवाने के लिए," ताऊजी ने दूर बने एक कच्चे छप्पर की ओर इशारा किया जो बाजरे के घने खेतों के बीच लगभग छुपा हुआ था।

"आज कोई दिख नहीं रहा खेतों में?" कामिनी ने चहकते हुए पूछा। सन्नाटे में उसे अपनी ही आवाज़ गूँजती हुई महसूस हो रही थी।

"अभी क्या काम बहुरानी? फसल तो बो दी है, अब तो बस ऊपर वाले की मेहरबानी और रखवाली का काम है," ताऊजी ने धीरे से कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।

जैसे ही दोनों एक बड़े बरगद के पेड़ के पास से मुड़े, अचानक मौसम ने अपना आखिरी पत्ता खेला। "टप... टप...'
आसमान से बारिश की दो-चार बड़ी बूँदें सीधे कामिनी के गर्म गालों और उसके खुले कंधों पर गिरीं। धूल भरी सूखी मिट्टी पर जब बारिश का पहला पानी पड़ा, तो उससे उठने वाली सोंधी खुशबू ने कामिनी के दिमाग में जैसे एक धमाका कर दिया। उसने एक गहरी साँस खींची और अपनी बाहों को हवा में थोड़ा फैला दिया।

"उउउफ्फ्फ.... ताऊजी! ऐसा मज़ा शहर की उस चारदीवारी में नहीं आता," कामिनी ने आँखें बंद कर लीं। ठंडी हवा और बारिश की उन बूँदों ने उसके स्लीवलेस ब्लाउज के अंदर छिपे जिस्म में एक सिहरन पैदा कर दी थी।
ताऊजी वहीं रुक गए और मंत्रमुग्ध होकर उस हुस्न की परी को निहारने लगे। हलकी बूंदो और हवा के मेल ने अपना काम शुरू कर दिया था। हवा के झोंकों से कामिनी की झीनी सूती साड़ी उसके जिस्म से चिपक गई थी, जिससे उसके पेट का गहरा उतार-चढ़ाव और उसकी नाभि की नज़ाकत साफ़ झलकने लगी।

बाजरे के ऊँचे और घने खेतों के बीच का सन्नाटा अब एक अजीब सी बेचैनी में बदल चुका था। बारिश की वो चंद बूँदें गिरकर रुक गई थीं, लेकिन मिट्टी से उठती वो सोंधी महक कामिनी के नसों में अफीम की तरह चढ़ रही थी।
जैसे ही कामिनी और ताऊजी पगडंडी के मोड़ पर पहुँचे, उनके कदमों के साथ-साथ उनकी धड़कनें भी ठिठक गईं। सामने पगडंडी के बीचों-बीच कुदरत का आदिम और नंगा खेल चल रहा था। एक मज़बूत कुत्ता अपनी पूरी ताकत से कुतिया पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। वह बार-बार पीछे से हमला करता, उसका सुर्ख लाल और सख़्त लंड किसी म्यान से निकलती तलवार की तरह बाहर आता और कुतिया कि चुत में समाने के लिए छटपटाता।

कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। शर्म के मारे उसका चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया, लेकिन वह अपनी नज़रें हटा नहीं पा रही थी। मदहोशी ने उसकी झिझक की दीवार को पहले ही कमज़ोर कर दिया था।

"हे.. हे... हुस्स्स.... भागो यहाँ से!" ताऊजी ने माहौल की गंभीरता को समझते हुए मिट्टी का एक ढेला उठाया, लेकिन जैसे ही उन्होंने हाथ चलाया, कुत्ते ने वहीं रुककर अपनी खूँखार आँखें ताऊजी पर गड़ा दीं।
"गुरररर.... गुररररररर...... भौं... भौं!"

कुत्ता अपने काम में बाधा पड़ते देख बुरी तरह गुरराया। उसकी आवाज़ में वो मर्दाना गुस्सा था जो किसी भी दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दे। ताऊजी और कामिनी डरकर दो कदम पीछे हट गए।

"रहने दो ताऊजी..." कामिनी ने धीमी आवाज़ में कहा। वह समझ सकती थी कि जब जिस्म की प्यास चरम पर हो और कोई उसे रोकने की कोशिश करे, तो रूह कितनी बागी हो जाती है। रमेश की नामर्दानगी और कई अधूरी रातों ने उसे इस 'बाधा' के दर्द से बखूबी वाकिफ कराया था।

कामिनी तिरछी नज़रों से उस बेबाक मिलन को देखती रही। इस बार कुत्ते ने अपनी कमर को एक खास कोण पर मोड़ा और पूरी शिद्दत से एक धक्का मारा धच...!' उसका पूरा लंड कुतिया की देह में समा गया। कुत्ता अब पागलों की तरह धक्के लगा रहा था और कुतिया बेबसी और आनंद के मिले-जुले स्वर में कुनमुना रही थी।

"आम बात है बहू, अब मौसम ही ऐसा हो गया है तो ये बेज़ुबान क्या करें," ताऊजी ने खखारते हुए माहौल को हल्का करना चाहा, लेकिन उनकी अपनी नज़रें कामिनी के सीने के उस उभार पर थीं जो तेज़ साँसों की वजह से धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे हो रहा था।

कामिनी का जिस्म भारी हो चुका था।  इस नज़ारे ने उसकी आँखों में लाल डोरे तैरा दिए थे। उसकी नाभि के नीचे एक मीठा सा दर्द और हलचल होने लगी थी। वह पूरी तरह भूल चुकी थी कि वह किसके साथ खड़ी है। वह तो बस उस 'आज़ादी' को देख रही थी जो उन जानवरों के पास थी।

"ये कुत्ते भी ना... कहीं भी शुरू हो जाते हैं, कोई शर्म-लिहाज़ नहीं," ताऊजी ने कामिनी की प्रतिक्रिया जाननी चाही।
"अच्छा है ना..." कामिनी के होंठों से एक बहुत ही बारीक फुसफुसाहट निकली। वह सोच रही थी काश! इंसानों की दुनिया में भी ये दिखावा, ये परदे और ये बंदिशें ना होतीं। काश! वह भी अपनी प्यास को इसी तरह सरेआम बुझा पाती।

"कुछ कहा बहू?" ताऊजी ने उसके और करीब आते हुए पूछा। उनके जिस्म की गर्मी अब कामिनी को महसूस हो रही थी।

"कक्क... क्या? ननन... नहीं तो!" कामिनी ने सकपकाते हुए ताऊजी की तरफ देखा। उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी। उसने झटके से कुत्ते पर से नज़रें हटाईं, लेकिन उसके मन के तहखाने में अब आग धधक चुकी थी।

ताऊजी ने देखा कि कामिनी के स्लीवलेस ब्लाउज से बाहर निकलते गोरे कंधे पसीने की बारीक बूंदों से चमक रहे थे। स्तनों कि घाटी पसीने से चमक उठी थी. 
उसका जिस्म गर्म होने लगा था, 
ठंडी हवा के बीच भी उसे गर्मी लग रही थी.

कुत्ते का खेल अपने चरम पर पहुँचा और वह एक झटके के साथ झड़ गया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने कामिनी के शहरी दिमाग को सुन्न कर दिया। कुत्ता और कुतिया एक-दूसरे से 'लॉक' हो चुके थे—विपरीत दिशा में मुँह किए हुए, वे बुरी तरह जुड़ गए थे।

कामिनी का मुँह हैरानी से खुला रह गया। उसने ऐसा मंज़र कभी नहीं देखा था। "ये... ये चिपक कैसे गए?" उसके मन में एक अजीब सी जिज्ञासा और सिहरन उठी।
"चलो बहू... इनका तो काम खत्म हुआ। अब ये ऐसे ही रहेंगे कुछ देर। आओ आगे दिखाता हूँ," ताऊजी ने एक अनुभवी शिकारी की तरह मुस्कुराते हुए कहा और बेपरवाही से उन कुत्तों के पास से गुज़र गए।

कामिनी उनके पीछे चली, लेकिन उसकी गर्दन बार-बार पीछे की ओर मुड़ रही थी। उसकी नज़रें उस 'जोड़' पर टिकी थीं। उसके मन में एक कौंध उठी "क्या इंसानों के साथ भी ऐसा ही होता होगा? क्या वासना का बंधन इतना गहरा हो सकता है कि जिस्म एक-दूसरे में जकड़ जाएँ?"

मदहोशी और उस नग्न दृश्य की उत्तेजना ने कामिनी के जिस्म को भारी कर दिया था। हर ठंडी लहर उसके बदन में एक नई हवस घोल रही थी। ताऊजी आगे-आगे रास्ता दिखा रहे थे, लेकिन उनका ध्यान पीछे चलती कामिनी की 'मटकती चाल' पर था।

उसी समय | हवेली का मुख्य दरवाज़ा

"अबे चल जल्दी! पैर उठा के चल!" बिट्टू लगभग लकी को घसीटते हुए हवेली की तरफ ला रहा था।
"अबे आराम से... थक गया हूँ साले! साँस तो लेने दे," लकी हाँफते हुए बोला। उसकी कमीज पसीने से तर थी और पिस्तौल उसकी बेल्ट में बार-बार खिसक रही थी।

दोनों इस बार पूरी तैयारी के साथ आए थे। दिन का उजाला था, लेकिन गाँव की गलियों में सन्नाटा था क्योंकि ज़्यादातर लोग खेतों या आराम में मगन थे। दोनों दबे पाँव हवेली के खुले हुए अहाते में दाखिल हुए। उन्होंने चारों तरफ नज़र दौड़ाई 

"यहाँ तो कोई नहीं है बे!" लकी ने ताऊजी की चारपाई खाली देखकर फुसफुसाते हुए कहा।
उन्होंने देखा कि मुख्य दरवाज़े पर बड़ा सा ताला लटका हुआ था। "कहा था ना जल्दी चल आलसी! सब हाथ से निकल गया," बिट्टू आग बबूला हो गया।
 उसकी आँखों में कामिनी को न पाने की खीझ साफ़ दिख रही थी।
"अब क्या करें? वापस चलें?" लकी ने डरते-डरते पूछा।
"वापस कैसे चलें?," बिट्टू ने दाँत पीसे। तभी उसे दूर पगडंडी की तरफ कुछ ताज़ा कदमों के निशान दिखे।

 "खेतों की तरफ चलें? हो सकता है वो लोग सैर पर निकले हों।"
लकी की आँखों में चमक आई। "अबे! पहली बार ठीक बोला। चल!

दोनों अपनी जेबों में हाथ डालकर, पिस्तौल सँभालते हुए उसी पगडंडी पर चल पड़े.
********************

खेतों के बीच का सन्नाटा अब कामिनी के लिए जानलेवा होता जा रहा था। बाजरे की ऊँची फसल ने उन दोनों को दुनिया की नज़रों से ओझल कर दिया था। कामिनी का गोरा बदन अब किसी धधकते हुए तवे की तरह जल रहा था। उसकी साँसें इस कदर फूल रही थीं कि उसे महसूस हुआ कि अब और चलना उसके बस की बात नहीं।

उसकी जाँघों के बीच एक गाढ़ा और गर्म चिपचिपापन रेंगने लगा। वह पसीना नहीं था, वह उसकी बरसों की अधूरी प्यास और हकीम कि दर्दनाशक दवा के असर का सैलाब था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही मंजर आ रहा था कैसे वो कुत्ता उस कुतिया में धँसा हुआ था।

ताऊजी, जो अब तक खामोश थे, अचानक कामिनी कि तरफ देखते हुए बोल पड़े

"तुझे पता है बहू, वो कुत्ता-कुत्ती चिपक क्यों गए थे?"

 ताऊजी की आवाज़ में एक ऐसी खुरदराहट थी जिसने कामिनी की रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर दी।
कामिनी सन्न रह गई। उसे उम्मीद नहीं थी कि ताऊजी जैसा बूढ़ा और ससुर समान आदमी उससे सरेआम ऐसा घिनौना और सीधा सवाल पूछेगा।

 उसे डांटना चाहिए था, उसे पलटकर वहाँ से भाग जाना चाहिए था। लेकिन जिस्म की खुमारी और भड़कती आग ने उसके विवेक को राख कर दिया था।

"कक्क... क्यों... क्यों चिपक गए थे?" कामिनी के होंठों से यह सवाल उसकी मर्ज़ी के बिना ही निकल गया। उसकी जिज्ञासा अब उसकी हया पर हावी हो चुकी थी।

"बहू... जब कुतिया बहुत 'चुदासी' होती है, तो वो कुत्ते के लंड को अंदर ऐसे जकड़ लेती है कि उसे छोड़ती नहीं," ताऊजी ने बिना किसी लाग-लपेट के, नंगे और साफ शब्दों में वार किया।
'चुदासी'....!

इस एक शब्द ने कामिनी के कलेजे पर किसी गर्म सलाख की तरह वार किया। उसे महसूस हुआ कि उसकी चुत के अंदर एक ज़ोरदार फड़कन हुई, जैसे उसकी चुत इस शब्द को सुनकर खुद भी वैसे ही जकड़ने के लिए बेताब हो गई हों।

ताऊजी यहीं नहीं रुके। उन्होंने कामिनी की कांपती हालत देखी और एक कदम और करीब आ गए। "जब कुतिया बहुत दिनों से चुदी ना हो... तो वो पागल हो जाती है। फिर उसे लाज-शर्म नहीं दिखती, उसे बस वो 'लंड ' चाहिए होता है जो उसकी आग बुझा सके।"

कामिनी अब तक पूरी तरह दहल चुकी थी। उसके कान गरम होकर लाल पड़ गए थे। उसे उस कुतिया की बेबसी में अपना अक्स नज़र आने लगा। 'बहुत दिन से चुदी ना हो...' रमेश की नामर्दानगी ने उसे कई हफ्तों से, कई महीनों से उसी प्यासी कुतिया की तरह छोड़ दिया था। उसे महसूस हुआ कि ताऊजी ने उसकी रूह को नंगा कर दिया है।

कामिनी का गला सूखने लगा। वह एक पल ताऊजी के उस झुर्रियों वाले लेकिन वहशी चेहरे को देखती, तो दूसरे ही पल अपने भारी होते जा रहे जिस्म को।

"चलते चलते ताऊजी की खुरदरी हथेलियाँ सीधे कामिनी की मखमली त्वचा से टकराईं।
कामिनी के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। 

 खेतों के बीच सन्नाटा इतना गहरा था कि कामिनी को अपनी ही धड़कनें किसी नगाड़े की तरह सुनाई दे रही थीं।
ताऊजी लगातार कामिनी कि मनोदशा से खेल रहा था, कामिनी को चुप पा कर, उसकी चढ़ती उतरती पसीने से भीगी घाटी को देख आगे कहा.
"रमेश बाबू तो बहुत किस्मत वाले है जो तुम जैसे औरत मिली " 
कामिनी बस मुँह बाये देख रही थी, उसका हल्का तो कबका सुख गया था " रमेश का नाम आते ही उसके सामने मुरझाया हुआ, मारा हुआ लंड उभर आया, वो लंड जो कुछ नहीं कर सकता "

"ऐसी चुदासी कुतिया को मज़बूत कुत्ता मिले, तभी बात बनती है बहू..." ताऊजी के ये शब्द किसी जलती हुई मशाल की तरह कामिनी के जिस्म में उतर गए।

"त.. तत... ताऊजी..." कामिनी के होंठ कांपे, पर शब्द हलक में ही दम तोड़ गए। वह मना करना चाहती थी, पर उसका भीगा हुआ जिस्म अब बगावत पर उतारू था। 

आसमान में काले बादल इस कदर घिर आए थे जैसे आज कुदरत भी किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रही हो। अचानक ताऊजी रुके और अपनी कमर पर हाथ रखकर बोले, "अच्छा बहू... ज़रा पेशाब लगा है, इस उम्र में रोकना मुश्किल हो जाता है।"

"हह.. हम्म..." कामिनी ने सिर्फ गर्दन हिला दी। पर 'पेशाब' शब्द सुनते ही उसके भीतर की दबी हुई वहशी जिज्ञासा जाग उठी।
उसकी कमजोरी जोर मारने लगी, मर्दो के लंड को देख लेने कि चाहत उजागर होने लगी,
याकायाक उसके मन मे एक विचार कोंध गया "ताऊजी का कैसा होगा?" 

 उसका दिमाग चीख रहा था "बस बहुत हुआ इस बदतमीज़ी को यही खत्म कर ", पर उसकी जांघो के बीच रिसती उस नमी ने उसे वहीं जकड़ लिया।

"कक्क... कर लीजिए," एक मरी हुई आवाज़ में कामिनी ने अनुमति दी।

ताऊजी पगडंडी से दो कदम नीचे उतरे और तिरछे खड़े हो गए। उन्होंने अपनी धोती के लांग को ढीला किया। सन्नाटे में कपड़ों की वो सरसराहट कामिनी के कानों में बिजली की तरह गूँजी।
मन किया एक बार पलट के देख ले, लेकिन नहीं... उसने खुद के मन पर काबू पाने कि पूरी कोशिश कि, नहीं वो नहीं पलटेगी.

तभी... ससससदररररर...... इस्स्स्स....
ज़मीन पर गिरती पेशाब की उस तेज़ धार की आवाज़ ने कामिनी के सब्र का बांध तोड़ दिया। उसने अनजाने में, लगभग बेहोशी की हालत में अपना सिर पीछे की तरफ घुमाया।

"ईईईस्स्स्स...... अअअअहहह!"
पीछे का नज़ारा देखते ही कामिनी की देह से उत्तेजना का एक ऐसा फव्वारा फूटा कि उसकी कच्छी को पार करता हुआ वो गर्म रस उसकी जाँघों पर फिसल आया।

 सामने ताऊजी का लंड झूल रहा था जो किसी इंसान का नहीं, बल्कि किसी जंगली सांड का लग रहा था। काला, लम्बा और ज़रूरत से ज़्यादा मोटा! लेकिन कामिनी की साँसें तो तब थम गईं जब उसकी नज़र नीचे लटकते दो अमरूद जैसे भारी और विशाल अंडकोषों पर पड़ी।

कामिनी ने आज तक ऐसा कुछ नहीं देखा था! उसके पैर बुरी तरह कांपने लगे। ताऊजी ने जो कुत्ते वाली कहानी सुनाई थी, वह अब उसके सामने एक सजीव हकीकत बनने लगी।

उसे महसूस हुआ कि वह वही 'चुदासी कुतिया' है जो इस 'खूँखार कुत्ते' के नीचे दबे होने के सपने देख रही है। उसे कल्पना होने लगी कि अगर वो भारी और मोटा लंड उसकी प्यासी चुत में उतरा, तो वह भी उस कुतिया की तरह 'लॉक' हो जाएगी.

ताऊजी ने तिरछी नज़र से कामिनी की फटी आँखों और उसके कांपते जिस्म को देखा। उन्होंने पेशाब ख़त्म की, लेकिन अपने अंग को तुरंत अंदर नहीं ढका। वह जानबूझकर उसे हवा में लहराते रहे, जैसे पेशाब कि लास्ट बून्द को निचोड़ फेंकेंगे.

ताऊजी का लंड को दिया हर एक झटका किसी कोड़े कि तरह कामिनी कि चुत पर पड़ रहा था.
इस्स्स्स.... कामिनी ने अपनी जांघो को आपस मे भींच लिया.
"चले बहु?" 
"अअअअअ... हाँ.. हाँ..." कामिनी बुरी तरह चोंकि, वो अपनी कल्पना मे इस कद्र मगन थी कि उसे पता ही नहीं चला कब ताऊजी उसके पास आ गए है.

हवा का रुख बदल चुका था और प्रकृति ने वासना के इस खेल में अपनी मुहर लगा दी थी। 
दोनों आगे को चल पड़े,  उत्तेजना, वासना ने कामिनी के अंदर एक ऐसा बवंडर पैदा कर दिया था कि उसे अपने संस्कारों की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढहती महसूस हो रही थीं।

शायद आसमान भी कामिनी कि इस हवस और उसके उत्तेजित गद्दाराये जिस्म को बर्दाश्त ना कर सका आसमान का सीना फटा टप.. टप.. थाड़... थाड़!

अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। देखते ही देखते खेतों पर पानी की चादर बिछ गई।

"अरे बहू! जल्दी चलो, भीग जाएँगे ऐसे तो। सामने मेरी झोपड़ी है," ताऊजी ने चिल्लाकर कहा।
कामिनी के पैर जैसे जमीन में धँस गए थे। उसे डर था कि उसकी एड़ी लचक जाएगी लेकिन ताऊजी ने बिना देर किए अपना मजबूत हाथ कामिनी के कोमल कंधे पर रख दिया और दूसरे हाथ से उसकी मखमली बांह को कसकर पकड़ लिया।

 ताऊजी का वह मर्दाना और गर्म स्पर्श कामिनी के भीगते हुए जिस्म में बिजली की तरह दौड़ा। ताऊजी उसे लगभग घसीटते हुए बाजरे के ऊंचे खेतों के बीच बनी उस कच्ची झोपड़ी की तरफ ले जाने लगे।

बारिश की ठंडी बूंदें बाहर से उसे भिगो रही थीं, लेकिन ताऊजी के जिस्म की तपिश उसे भीतर से पिघला रही थी। कामिनी इस वक्त उस कगार पर थी जहाँ उसे कोई भी चोद लेता, तो वह मना नहीं कर पाती।

 उसकी आँखें मदहोशी में कभी बंद होतीं तो कभी खुलतीं। झोपड़ी की ओर बढ़ते हर कदम के साथ उसकी धड़कनें बेकाबू हो रही थीं।

जैसे ही दोनों झोपड़ी के भीतर दाखिल हुए, बाहर की दुनिया का शोर एक भारी खामोशी में बदल गया। अंदर एक पुराना पीला बल्ब टिमटिमा रहा था, जिसकी मद्धम रोशनी झोपड़ी की दीवारों पर नाच रही थी। सामने एक पुरानी चारपाई बिछी थी और कोने में खेती के कुछ औजार रखे थे।
"ये बारिश... सत्यानाश! बिल्कुल भीग गए बहू," ताऊजी ने अपनी धोती निचोड़ते हुए कहा।
लेकिन जैसे ही ताऊजी की नज़र कामिनी पर पड़ी, उनके होश उड़ गए। सफ़ेद रंग की सूती साड़ी पानी से भीगकर पारदर्शी हो चुकी थी। वह कामिनी के उभारों, उसकी सुडौल जाँघों और सुडौल स्तनों से इस तरह चिपक गई थी मानो कामिनी ने कुछ पहना ही न हो। ठंडी बूंदों के स्पर्श से कामिनी के अंग-अंग में एक सिहरन थी, उसके रोंगटे खड़े  हो चुके थे और साड़ी के नीचे से उसके शरीर का एक-एक कटाव साफ़ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।

कामिनी की हालत भी कुछ कम नहीं थी। बाहर से उसका बदन ठंडा था, पर उसकी नाभि के नीचे से एक असहनीय गर्मी का लावा फूट रहा था।
 उसने सामने देखा ताऊजी का भीगा हुआ कुर्ता और धोती उनके कसरती और मज़बूत जिस्म से चिपक गए थे। उस गीली धोती के पीछे ताऊजी के भारी लंड की रूपरेखा किसी पहाड़ की तरह उभरी हुई थी, जो बार-बार कामिनी की नज़रों को अपनी तरफ खींच रही थी।

दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थे—साँसें तेज़, आँखों में हवस की लाली और जिस्मों में आग। कामिनी की चेतना अब पूरी तरह खो चुकी थी। वह बस ताऊजी के उस उभरे हुए हिस्से को देख रही थी,  झोपड़ी के भीतर अब सिर्फ बारिश की आवाज़ थी और दो जिस्मों की सुलगती हुई प्यास।
***********************

खेतों के दूसरे छोर पर, जहाँ बाजरे की ऊँची फसल हवा के झोंकों से इधर-उधर झूम रही थी, लकी और बिट्टू किसी शिकारी कुत्ते की तरह कामिनी और ताऊजी की गंध ढूँढ रहे थे। पर किस्मत ने उनके साथ भी खेल खेलना शुरू कर दिया था।

"अबे कहाँ गए सब? कोई भी नहीं है यार यहाँ! फालतू ही इस कीचड़ और गंदगी में आ गए," लकी ने अपनी गीली हो रही कमीज को झटकते हुए खीज कर कहा। उसका गुस्सा अब सातवें आसमान पर था।

"अबे चुप रह! कहाँ जाएँगे? इसी रास्ते पर कदमों के निशान थे, नज़र दौड़ा," बिट्टू ने अपना हौसला बनाए रखा, हालाँकि उसकी अपनी हालत भी खराब हो रही थी।
तभी आसमान से कहर बरसना शुरू हुआ "टप... टप... टापाक... थाड थाड़!

बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ ही पलों में सब कुछ धुंधला गया। "अबे ये बारिश कहाँ से आ गई साला! सब सत्यानाश हो गया," लकी ने अपनी पिस्तौल निकाली और उसे भीगने से बचाने के लिए अपनी शर्ट के नीचे, जिस्म से सटाकर छुपा लिया।

बिट्टू ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और दूर, बाजरे के घने झुरमुट के पीछे दिख रहे एक साये की तरफ इशारा किया। "सुन... वो देख! वो झोपड़ी सी दिख रही है ना वो दूर? चल जल्दी, वहीं बचते हैं फिलहाल। भीग गए तो बुखार चढ़ जाएगा। उस औरत को बाद में ढूँढेंगे,

क्रमशः 


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8 Comments

  1. Ek dam hot update bhai maza agaya kamini puri garam ho gayi aur ab tau ki kutiya ban kar uske jhopde mai chudegi

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    1. कामुक वाइनApril 21, 2026 at 3:37 AM

      कामिनी चुदने ही वाली है, लेकिन कुतिया किसकी बनेगी वो आपके सब्र पर निर्भर करता है

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  2. Tauji aur kamini pass to aa gaye hai fir bhi muze kuch ajib sa lag lag raha hai

    Lucky aur bittu ko bhi zopdi ke pass hi ana tha
    Main agle update baad hi kuch keh paunga

    Asha karta hu main jis tarah negetive soch raha hu waise kuch na ho

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    1. कामुक वाइनApril 21, 2026 at 3:38 AM

      भाई अपनी सोच को लगाम दो, वरना इंसान जो सोचता है वो हो जाता है

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  3. Fantastic update
    Ye kamini to apni har paar kar rahi hai
    janti hai wo dawai viagra ka kaam karti hai fir bhi wapis pi liya
    Wo kutte wala scene(lock) kamini ke upar jarur try karna

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  4. Exciting update diya hai bhai
    Tauji to todenge hi par raat ko haweli bhi Jana hai
    Haweli jane se pehle kamini fir se 5 bunde dawai aur pile bus jo uska haal haweli pe kadar karne wala hai na...

    Kamini waise bhi langda rahi hai pao ke moch ki vajah se
    Kal subah kisi ko kuch pata nahi chahega😛(bunty ke siva)

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    1. कामुक वाइनApril 21, 2026 at 3:40 AM

      बस भाई कामिनी जाने ही वाली है फ़ौजा सिंह कि हवेली

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  5. Zabardast update
    Kamini ki aise ghamasan chudai karwa do ke Zopdi ki buniyad dagmaga jaye😉
    Zopdi me rakhi charpai bhi charmara jaye
    Waiting

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