मेरी माँ कामिनी - भाग 27 

दोपहर के 12 बज रहे थे। घर में कब्रिस्तान जैसी खामोशी थी।
कामिनी लिविंग रूम के सोफे पर पसरी हुई थी। उसने सिर्फ़ अपना साटन का गाउन पहना हुआ था।
दर्द और सूजन के कारण वह अपनी टांगें सटाकर नहीं बैठ पा रही थी, इसलिए उसने अपने पैर सोफे पर फैला रखे थे और गाउन के नीचे उसकी जांघें चौड़ी थीं।
हर पल उसे अपनी योनि और कमर में एक मीठी-मीठी टीस महसूस हो रही थी, जो उसे बार-बार कल रात के 'तूफ़ान' की याद दिला रही थी।
तभी, मुख्य दरवाज़े (Main Door) के खुलने की आवाज़ आई।
"खट... खट..."
कामिनी चौंक गई। उसे लगा शायद बंटी वापस आ गया, लेकिन इतनी जल्दी?
कामिनी जैसे-तैसे कराहते हुए उठी और घर का दरवाजा खोला।
सामने रघु खड़ा था।
वह पसीने से लतपत था, उसकी सांसें फूल रही थीं, जैसे वह कहीं दूर से भागता हुआ आया हो। उसके हाथ में कांच की एक छोटी, पुरानी सी शीशी थी जिसमें हरे रंग का कोई गाढ़ा तेल भरा था।

सुबह से रघु को न पाकर कामिनी के अंदर जो गुस्सा भरा था, वह एकदम से फूट पड़ा।
"कहाँ मर गए थे तुम?" कामिनी दर्द के बावजूद चिल्लाई, उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। "मैं यहाँ दर्द से मरी जा रही हूँ, चल भी नहीं पा रही... और तुम सुबह से ही शराब पीने निकल गए?"

रघु ने कोई सफाई नहीं दी, बस धीरे से मुस्कुराया और वह शीशी ऊपर उठा दी।
"भागने के लिए नहीं मालकिन..." रघु ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, "आपके दर्द का इलाज लेने गया था।"
कामिनी का गुस्सा थोड़ा ठंडा हुआ। वह लंगड़ाते हुए वापस सोफे पर गई और टांगें चौड़ी करके धंस गई।

रघु सोफे के पास आया और घुटनों के बल नीचे कालीन पर बैठ गया।
"वो कल वाला दोस्त याद है मेरा, कादर खान..." रघु ने शीशी का ढक्कन खोलते हुए कहा। "उसके दादा जड़ी-बूटियों के जानकार थे, कुछ उसे भी सीखा गए। जेल में पुलिस की मार के बाद मेरे घाव पर वो ये तेल लगाता था, पल भर में दर्द उड़ जाता था।"

"कादर खान..."
रघु के मुंह से यह नाम सुनते ही कामिनी का दिमाग फ्लैशबैक में चला गया।
उसे याद आया अस्पताल का वो नज़ारा... जब वह रघु को लेकर गई थी। 

गुंडों जैसा चेहरा, बेबाक आँखें, मुंह में पान, और गले में काला ताबीज़। उसने कामिनी को देखकर भी अनदेखा कर दिया था, जैसे कामिनी उसके लिए सिर्फ़ मांस का एक लोथड़ा हो।
उसकी वो 'मावली' शक्ल, वो खूंखार और लापरवाह अंदाज़...
अचानक, कामिनी की योनि में—जो रघु की रगड़ से छिल चुकी थी—एक अजीब सी सनसनी हुई।
यह दर्द नहीं था... यह हवस की खुजली थी।
कामिनी ने अपनी जांघें आपस में भिंच लीं।

'हे भगवान... मुझे क्या हो गया है? मैं उस जाहिल गुंडे के बारे में सोचकर गीली हो रही हूँ?'
कामिनी को अपनी फितरत पर हैरानी हुई, लेकिन उसका जिस्म अब 'सभ्यता' नहीं, 'असली पौरुष' मांग रहा था।
रघु ने अपनी हथेली पर तेल उंडेला। तेल से कपूर और जड़ी-बूटियों की तेज़ गंध आई।
रघु ने अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ा जिससे तेल गरम हो गया।
वह कामिनी के गाउन को नीचे से उठाने लगा।
कामिनी का हाथ अचानक रघु के हाथ पर गया। वह ठिठक गई।
भले ही उसने कल रात रघु के साथ हदों को पार कर दिया था, लेकिन अब दिन की रौशनी में, होश में, उसे थोड़ी झिझक महसूस हुई।

"र... रहने दो रघु..." कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा। "लाओ मुझे दे दो, मैं खुद लगा लूँगी।"
रघु रुका। उसने अपनी गहरी, काली आँखों से कामिनी को देखा।
उसके चेहरे पर एक रस्यमयी मुस्कान आई।
"अब क्या शर्माना मालकिन?" रघु ने नरमी मगर अधिकार से कहा। "मुझसे क्या छिपा है अब? आपके बदन का कोना-कोना कल रात मेरी मुट्ठी में था। यह शरीर अब सिर्फ़ आपका नहीं है..."

कामिनी के पास कोई जवाब नहीं था। रघु सच कह रहा था। पर्दा तो कल रात ही जल चुका था।
कामिनी ने धीरे से अपना हाथ हटा लिया और अपनी आंखें बंद कर लीं, मूक सहमति देते हुए।
रघु ने गाउन को घुटनों से ऊपर सरकाया।
कामिनी की गोरी, सुडौल और भरी हुई पिंडलियां (Calves) अनावृत हो गईं।
रघु ने अपनी गरम, तेल से सनी हथेलियां कामिनी की पिंडलियों पर रख दीं।
"छनन्न......"
कामिनी के मुंह से एक सिसकी निकल गई।
रघु के खुरदरे, मज़बूत हाथ और वो जादुई तेल... जैसे ही त्वचा से मिले, एक करंट सा दौड़ गया।

रघु ने धीरे-धीरे, लेकिन मज़बूती से मालिश शुरू की।
वह अपने अंगूठों को कामिनी के मांस में गड़ाता और नीचे से ऊपर की ओर खींचता।
"दब्ब... दब्ब...!"
रघु के हाथों का घर्षण गर्मी पैदा कर रहा था।
वह धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा... घुटनों को पार करते हुए... कामिनी की विशाल और मांसल जांघों (Thighs) पर।
कामिनी की जांघें अंदर से लाल और सूजी हुई थीं।
रघु ने वहां तेल की मात्रा बढ़ा दी।

उसके बड़े-बड़े हाथ कामिनी की गोरी जांघों को आटे की तरह गूंध रहे थे।
"आह्ह्ह... रघु... आराम से... वहां बहुत दर्द है..." कामिनी सिसकी, लेकिन उसने अपनी टांगें और चौड़ी कर दीं ताकि रघु अंदर तक पहुँच सके।
रघु अब अंदरूनी जांघों (Inner Thighs) पर आ गया था।

उसके हाथ योनि के होठों (Labia) से महज़ एक इंच की दूरी पर चल रहे थे।
उसकी उंगलियां बार-बार कामिनी की पैंटी-लाइन (जहाँ पैंटी नहीं थी) को छू रही थीं।

कामिनी की सांसें भारी हो गईं।
तेल की गर्माहट और रघु का स्पर्श मिलकर एक नशा पैदा कर रहे थे।
रघु की उंगलियां जब भी जांघों के जोड़ (Groin) के पास रगड़तीं, कामिनी का पेल्विस (Pelvis) अपने आप हवा में उठ जाता।

रघु ने मालिश करते हुए कामिनी के चेहरे को देखा।
मालकिन की आँखें बंद थीं, होंठ खुले थे, और माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें थीं।
रघु ने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी। उसने योनि को नहीं छुआ, लेकिन उसके आस-पास के हर इंच को अपनी गर्मी से भर दिया।

वह दर्द खींच रहा था और मज़ा भर रहा था।
कामिनी का दिमाग सुन्न होने लगा।
कादर खान का तेल सचमुच जादुई था। दर्द ऐसे गायब हो रहा था जैसे भाप।
शरीर में एक अजीब सा हल्कापन और खुमारी (Intoxication) छाने लगी।

रघु के हाथों की वो लयबद्ध गति (Rhythmic motion)... तेल की वो गंध... और अंदर सुलगती हुई काम-अग्नि...
कामिनी को पता ही नहीं चला कि कब उसकी सिसकियाँ धीमी पड़ गईं।
कब उसका तना हुआ शरीर ढीला पड़ गया।
रघु मालिश करता रहा, और कामिनी उसी सोफे पर, अपनी टांगें रघु के सामने फैलाए, एक गहरी, नशीली नींद के आगोश में समा गई।
*******************

घड़ी की सुईयां शाम के 4 बजा रही थीं।
कमरे में भारी पर्दों के कारण हल्की-हल्की रौशनी थी।
कामिनी ने एक गहरी, सुकून भरी नींद के बाद अपनी आँखें खोलीं।
पहला अहसास जो उसे हुआ, वह था— नरमी।
उसने करवट ली और पाया कि वह सोफे पर नहीं, बल्कि अपने बेडरूम के मखमली गद्दे पर लेटी है।
और दूसरा अहसास, जिसने उसकी धड़कनों को बढ़ा दिया— वह पूरी तरह नंगी थी।
उसके शरीर पर न गाउन था, न कोई कपड़ा। वह सिर्फ़ एक पतली सी चादर के नीचे, अपनी प्राकृतिक अवस्था में लेटी थी।
कामिनी हड़बड़ाकर उठ बैठी। चादर सरककर उसकी कमर तक आ गई, जिससे उसके भारी, सुडौल स्तन आज़ाद होकर हवा में झूल गए।

"मैं यहाँ कैसे आई?" कामिनी ने सोचा।
उसे याद आया... रघु सोफे पर उसकी मालिश कर रहा था... उसकी उंगलियां जांघों पर चल रही थीं... और फिर उसे नींद आ गई थी।
इसका मतलब... रघु ने उसे अपनी गोद में उठाया होगा। उसे बेडरूम तक लाया होगा। और फिर... अपने उन खुरदरे हाथों से, कामिनी का गाउन उतारा होगा।
कामिनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
उसने कल्पना की—कैसे रघु ने उसके बेहोश जिस्म को निहारा होगा, कैसे उसे नंगा किया होगा।
कामिनी ने अपने पैरों को हिलाया। उसने अपनी कमर मोड़ी।
और वह दंग रह गई।
दर्द गायब था!
न जांघों में वो टीस, न कमर में वो जकड़न, और न ही योनि में वो जलन।
उसका शरीर किसी रबर की गुड़िया की तरह लचीला और हल्का महसूस हो रहा था।
कामिनी ने अपनी जांघों पर हाथ फेरा। वहां की त्वचा मक्खन जैसी मुलायम हो गई थी। तेल की एक भीनी-भीनी खुशबू अभी भी उसके रोम-रोम में बसी थी।

"कादर खान...का तेल " कामिनी के होंठों पर एक मुस्कान तैर गई। 

तभी, साइड टेबल पर रखा उसका मोबाइल थरथराने लगा।
कामिनी ने झुककर फ़ोन उठाया। स्क्रीन पर 'सुनैना' (रवि की मम्मी) का नाम था।
कामिनी ने गला साफ़ किया और अपनी आवाज़ में ताज़गी भर ली।
"हाँ सुनैना जी, नमस्ते..."
"नमस्ते भाभी जी!" उधर से सुनैना की चहकती हुई आवाज़ आई। "सो तो नहीं रही थीं? वो बंटी ने बताया कि आपकी तबियत थोड़ी नासाज़ है?"

"नहीं-नहीं," कामिनी ने हंसते हुए कहा, और अपनी जांघों को एक-दूसरे से रगड़ा। " छोटा मोटा चलता रहता है, अब ठीक हूँ, आप बताइये?

"अरे वाह! फिर तो कोई बहाना नहीं चलेगा," सुनैना ने उत्साह से कहा। "आज रात का डिनर हमारे घर पर है। बंटी के नए स्कूटर की पार्टी समझ लीजिये। और एक खास बात और है... रवि के पापा (विक्रम जी) भी टूर से वापस आ गए हैं। उनकी बड़ी इच्छा थी आपसे और रमेश भाई साहब से मिलने की। तो प्लीज, 7:30 बजे तक आ जाइयेगा।"

'रवि के पापा...'
यह शब्द सुनते ही कामिनी के दिमाग में एक घंटी बजी।
रवि जैसा प्यारा और गोरा-चिट्टा बेटा... सुनैना जैसी मॉडर्न और तीखी बीवी... तो रवि का बाप कैसा होगा?
क्या वह भी रमेश जैसा ही ढीला-ढाला होगा? 
ना जाने क्यों कामिनी के जहन मे रवि के बाप को देखने की इच्छा कुलबुलाने लगी.

कामिनी का दिमाग अब हर मर्द को एक 'संभावना' की तरह देखने लगा था। उसकी जिज्ञासा जाग उठी।
कामिनी के जीवन, उसके चरित्र मे एक बदलाव आ गया था, वो मर्दो को एक अलग नजर से देखने लगी थी.

"जरूर आएंगे सुनैना जी," कामिनी ने वादा किया। "मैं रमेश को बता देती हूँ।"

फ़ोन रखते ही कामिनी ने रमेश को कॉल लगाया।
रमेश, जो ऑफिस में बैठा अपनी 'मर्दानगी' के ख्यालों में खोया था, कामिनी का फ़ोन देखकर खिल उठा।

कामिनी ने उसे पार्टी और विक्रम जी के बारे में बताया।
"अरे वाह!" रमेश खुश हो गया। (मन ही मन उसे सुनैना से मिलने की ख़ुशी थी)।

" मैं 6 बजे तक पक्का घर आ जाऊंगा।"
"और सुनिये..." कामिनी ने हिदायत दी, "आज पीकर मत आना। पहली बार किसी के घर जा रहे हैं, इंप्रेशन ख़राब नहीं होना चाहिए।"

"अरे डार्लिंग, आज तेरा पति बिल्कुल 'साधु' बनकर आएगा," रमेश ने हंसते हुए कहा। "आज सिर्फ़ सभ्य और संस्कारी रमेश बाबू दिखाई देंगे।"
रमेश ने अंदर वाकई आज देवता बैठा था, भले ही सुनैना के लालच मे लेकिन था तो सही.

फ़ोन कट गया।
कामिनी बिस्तर से उठी और सीधे बाथरूम की तरफ बढ़ी।
उसने गीजर ऑन किया और शावर के नीचे खड़ी हो गई।
गरम पानी की बूंदें जब उसके तेल लगे जिस्म पर गिरीं, तो पानी मोतियों की तरह फिसलने लगा।
कामिनी ने साबुन लगाकर अपने स्तनों, अपनी कमर और अपनी जांघों को साफ़ किया।

रघु का वीर्य और कादर का तेल—सब कुछ पानी के साथ बह गया, लेकिन उनकी यादें कामिनी के अंदर छप चुकी थीं।
नहाने के बाद, कामिनी तौलिया लपेटकर बाहर आई और ड्रेसिंग टेबल के आदमकद शीशे के सामने खड़ी हो गई।
उसने तौलिया खोल दिया।
शीशे में... एक 'नयी कामिनी' खड़ी थी।
उसका रंग और भी निखर गया था। उसकी आँखों में एक अजीब सा नशा और आत्मविश्वास था।

उसकी नज़र अपनी गर्दन और छाती के ऊपरी हिस्से पर गई।
वहाँ रघु के दिए नीले निशान (Love Bites) अब हलके पड़ चुके थे, रघु की छाप छूटने लगी थी.

कामिनी ने अपनी उंगलियां उन निशानों पर फेरीं।
"ईईस्स्सह्ह्ह... आअह्ह्हम्म..... एक मीठी लहर दौड़ गई, अब इन निशान पर दर्द नहीं था सम्पूर्ण कामुकता की इबारत बन कर रह गए थे वो बेंगनी निशान.

कामिनी ने अपनी अलमारी खोली।
उसने एक गहरे लाल रंग (Deep Red) की शिफॉन साड़ी निकाली। यह साड़ी 'सभ्य' भी थी, लेकिन इसका कपड़ा इतना पारदर्शी था कि शरीर के कटाव साफ़ झलकते थे।

ब्लाउज उसने स्लीवलेस और डीप-नेक (Deep Neck) वाला चुना।
तैयार होते वक़्त कामिनी ने सिंदूर लगाया, मंगलसूत्र पहना... वही मंगलसूत्र जो कल रात रघु के लंड से टकरा रहा था।

उसने हल्का मेकअप किया, आँखों में काजल लगाया, और होठों पर सुर्ख लाल लिपस्टिक।
वह किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी, लेकिन जिसकी आँखों में दुल्हन वाली शर्म नहीं रह गई थी, बल्कि एक सम्पूर्ण संतुष्ट वाली औरत की चमक थी।

6 बजते ही रमेश आ गया।
जैसा उसने वादा किया था, वह बिना पिए आया था। उसके कपडे साफ थे, बाल वैसे ही थे जैसे घर से सुबह निकला था,

जैसे ही वह कमरे में आया और कामिनी को देखा... उसके कदम रुक गए।
"उफ्फ्फ..." रमेश के मुंह से निकला। "कामिनी... आज तो तुम कहर ढा रही हो। कसम से, अगर आज सुनैना जी के घर ना जाना होता तो आज फिर..."
रमेश बिना पिए दुनिया का सबसे सभ्य आदमी होता था.

कामिनी ने उसे पास आने से रोक दिया।
"खबरदार जो हाथ लगाया," कामिनी ने नखरे से कहा, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान थी। "साड़ी ख़राब हो जाएगी। चलो, देर हो रही है।"

रमेश, कामिनी की खूबसूरती (और अपनी तथाकथित मर्दानगी) के नशे में चूर होकर आगे-आगे चला।
और कामिनी, अपनी एड़ियों की 'टक-टक' के साथ पीछे चली।
उसकी चाल में अब लंगड़ापन नहीं था, बल्कि एक लचक थी। एक ऐसी लचक जो सिर्फ़ एक 'संतुष्ट' औरत में ही आ सकती है।
रमेश ने car मंगवा ली थी, 
"घर का ध्यान रखना बे? " जाते जाते बड़ी ही बदतमीज़ी से रमेश रघु को आदेश देता चला जा रहा था.
*****************

रमेश की कार सुनैना के आलीशान बंगले के सामने रुकी।
यह बंगला रमेश के घर से कहीं बड़ा और आधुनिक था। गेट पर ही एक बड़ा सा नेमप्लेट लगा था— "विक्रम सिंह - कमिश्नर (एक्साइज)"।
नेमप्लेट देखकर ही रमेश ने अपनी टाई ठीक की और बालों पर हाथ फेरा। वह एक मामूली सिविल इंजीनियर था, और विक्रम एक बहुत बड़ा सरकारी अफसर। यह हीनभावना (Inferiority Complex) रमेश के चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।
कामिनी कार से उतरी।
उसकी गहरे लाल रंग की शिफॉन साड़ी शाम की हवा में लहरा रही थी। रघु की 'सेवा' और कादर खान के तेल ने उसके बदन में जो लोच पैदा की थी, वह उसकी चाल में साफ़ दिख रही थी।
दोनों ने पोर्च पार किया और घंटी बजाई।
कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुला।
सामने विक्रम सिंह खड़ा था।

कामिनी की नज़रें उठती चली गईं। विक्रम 6 फुट 2 इंच का एक विशालकाय पुरुष था।
उसकी उम्र 50 के आसपास रही होगी, लेकिन शरीर किसी पहलवान जैसा कसा हुआ था। चौड़े कंधे, बाहर को निकला हुआ मज़बूत सीना, और चेहरे पर 'साल्ट एंड पेपर' (काली-सफ़ेद) फ्रेंच कट दाढ़ी।

उसने एक सफ़ेद कुर्ता-पाजामा और ऊपर से एक गहरे नीले रंग की स्लीवलेस जैकेट पहनी थी।
वह सिर्फ़ खड़ा नहीं था, वह जगह को डोमिनेट (Dominate) कर रहा था। उसकी शख्सियत से एक 'अल्फा मेल' (Alpha Male) की महक आ रही थी।

रमेश ने अपनी बत्तीसी दिखाते हुए हाथ बढ़ाया। "नमस्ते विक्रम सर! मैं रमेश..."
विक्रम ने एक हल्की मुस्कान के साथ अपना विशाल पंजा आगे बढ़ाया।
जैसे ही दोनों के हाथ मिले, विक्रम ने रमेश के हाथ को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
रमेश की उंगलियां उस लोहे की पकड़ में दब गईं।
"नमस्ते रमेश जी," विक्रम की आवाज़ भारी और गूंजने वाली (Baritone) थी। "सुना है आप सिविल इंजीनियर हैं? बहुत नाम सुना है आपका।"

यह सिर्फ़ शिष्टाचार था, लेकिन रमेश उस भारी आवाज़ और मज़बूत पकड़ के सामने एक बौना महसूस करने लगा।
फिर विक्रम की नज़र कामिनी पर गई।
"और ये..."
"जी, ये मेरी पत्नी कामिनी," रमेश ने जल्दी से परिचय कराया।
"वो तो मै देखते ही समझ गया था, आप कामिनी जी है... रवि खूब तारीफ करता है आपकी, अपने उसका बहुत अच्छे से ध्याब रखा"
विक्रम की शेर जैसी आँखें कामिनी के चेहरे से होती हुई नीचे तक गईं।
वह उम्मीद कर रहा था कि रमेश जैसे मामूली आदमी की बीवी भी मामूली होगी।

लेकिन सामने एक अpsara खड़ी थी।
कामिनी की सादगी ने विक्रम को पहली ही नज़र में घायल कर दिया।
सुनैना (विक्रम की पत्नी) हमेशा मॉडर्न कपड़े, भारी मेकअप और इंग्लिश परफ्यूम में रहती थी। विक्रम उस बनावटीपन से ऊब चुका था।

और यहाँ कामिनी थी—माथे पर सिन्दूर, गले में मंगलसूत्र, लाल साड़ी, और आवाज़ में एक मीठा, देसीपन।
कामिनी ने झुककर शालीनता से नमस्ते किया। "नमस्ते भाई साहब।"
विक्रम के दिल में एक हलचल हुई।
'ऐसी औरतें अब कहाँ मिलती हैं?' विक्रम ने सोचा। 'इतनी भरी-पूरी, इतनी संस्कारी... और रमेश जैसा लंगूर इस अंगूर को रख रहा है?'

विक्रम की नज़र कामिनी की गर्दन पर गई, जहाँ साड़ी के पल्लू की आड़ में वो हल्का सा नीला निशान झांक रहा था।
विक्रम की आँखों में एक चमक आ गई। वह समझ गया कि यह 'संस्कारी' देवी रात के अंधेरे में कुछ और ही है।
उधर, कामिनी भी विक्रम को देखकर दंग थी।

उसने मन ही मन सोचा— 'हे भगवान! इतना मर्दाना आदमी... इतना रुतबा... फिर भी सुनैना जी बाहर क्यों भटक रही हैं? क्या कमी है इस आदमी में?'

कामिनी की योनि, जो अभी-अभी ठीक हुई थी, विक्रम के उस भारी-भरकम शरीर को देखकर फिर से संकुचित (Clench) हो गई।
रघु 'जानवर' था, लेकिन विक्रम एक 'राजा' था।
तभी अंदर से सुनैना आई।
सुनैना ने एक स्लीवलेस गाउन पहना था, बाल छोटे कटे थे, और हाथ में वाइन का ग्लास था।

"अरे रमेश जी! कामिनी भाभी! वेलकम!" सुनैना चहकी।
सुनैना की उस मॉडर्न अदा को देखकर रमेश पिघल गया।
उसने कामिनी की तरफ देखा और फिर सुनैना की तरफ।
रमेश के दिमाग में वही पुरुषवादी कीड़ा रेंगने लगा।
'मेरी बीवी तो गांव की गवार है... असली औरत तो ये है—सुनैना। क्या क्लास है, क्या स्टाइल है। विक्रम कितना खुशनसीब है।'

यही विडंबना (Irony) उस ड्राइंग रूम में नाच रही थी।
विक्रम को अपनी मॉडर्न बीवी (सुनैना) प्लास्टिक की गुड़िया लग रही थी, और उसे रमेश की 'गवार' बीवी (कामिनी) में असली औरत की महक आ रही थी।

वही रमेश को अपनी वफादार और भरी-पूरी बीवी (कामिनी) बोरिंग लग रही थी, और उसे विक्रम की 'चालू' बीवी (सुनैना) में स्वर्ग दिख रहा था।
मर्दों की फितरत का यही कड़वा सच है— "जो हासिल है उसकी कोई औकात नहीं, और जो दूसरे के पास है, वही कोहिनूर है।"

विक्रम ने इशारा किया। "आइये, बैठिये।"
कामिनी जब सोफे पर बैठने लगी, तो विक्रम की नज़रें बेशर्मी से उसकी कमर के घुमाव और साड़ी के नीचे हिलते हुए भारी नितम्बों पर टिकी थीं।
कामिनी ने यह देख लिया।
उसने पल्लू ठीक करने का नाटक किया, लेकिन असल में उसने अपनी गर्दन का वह लव-बाइट विक्रम की नज़रों के सामने और साफ़ कर दिया।




(क्रमशः)